
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
18 days ago
🌼 तत्त्वज्ञान — आत्मा, ब्रह्म और सृष्टि का बोध 🌼 ● तत्त्वज्ञान का स्वरूप :--- "तत्त्वज्ञान" का अर्थ है — 'तत्' (परमात्मा) और 'त्वम्' (जीवात्मा) — इन दोनों के अभिन्नत्व का बोध। जब जीवात्मा अपने शाश्वत स्वरूप को परमात्मा से एक रूप जानता है, तभी तत्त्वज्ञान का उदय होता है। यह ज्ञान न केवल आत्मा और ब्रह्म की यथार्थ पहचान कराता है, अपितु सृष्टि के रहस्यों, जीवन के उद्देश्य तथा कर्मों की अनिवार्यता को भी उद्घाटित करता है। तत्त्वज्ञान को सुगम रूप में समझाने हेतु सत्य को पाँच अंगों में विभाजित किया गया है: १. परमात्मा २. प्रकृति ३. जीवात्मा ४. काल (समय) ५. कर्म --------------- ❗️ १. परमात्मा :--- परमात्मा पूर्णरूपेण स्वतंत्र, परम पवित्र, निर्गुण-सगुण से परे तथा समस्त सृष्टि के कारण रूप हैं। वे सृष्टि के उत्पत्तिकर्ता, पालक और संहारक हैं। उन पर काल और देश का बंधन नहीं चलता। वे सर्वव्यापी, सर्वज्ञ और अविनाशी हैं। ❗️ २. प्रकृति :--- ईश्वर से ही जीव तथा प्रकृति की उत्पत्ति होती है। प्रकृति को शक्ति भी कहा गया है। यह शक्ति दो स्वरूपों में प्रकट होती है: ▪︎ अविद्या (अपरा विद्या) — निम्न प्रकृति ▪︎. विद्या (परा विद्या) — उच्चतर दिव्य शक्ति माया प्रकृति का अविद्या रूप है — "या मा सा माया" — अर्थात जो सत्य नहीं है, किन्तु सत्य प्रतीत होती है। ईश्वर सृष्टि की रचना हेतु इस माया रूपी शक्ति का आश्रय लेते हैं। 🔹 माया का कार्य संसार को भासमान बनाना है। 🔹 प्रकृति स्वयं जड़ है — उसमें गति केवल परमात्मा की संकल्प शक्ति से आती है। 🔹 सृष्टि के प्रारंभ में यह प्रकृति साम्यावस्था में रहती है — जहाँ सत्त्व, रज, और तम तीनों गुण सम मात्रा में रहते हैं। ईश्वर के संकल्प से इन गुणों में विषमता उत्पन्न होती है और सृष्टि की विविधता प्रारंभ होती है। ● सृष्टि क्रम :--- तम ➡ आकाश ➡ वायु ➡ अग्नि ➡ जल ➡ पृथ्वी इन्हीं पञ्चभूतों से समस्त सृष्टि का आविर्भाव होता है। इन्द्रियों के विषय — रूप, रस, गंध, स्पर्श, शब्द — ये सब माया के क्षेत्र में आते हैं। 🔹 माया अहंकार, लोभ, क्रोध, ईर्ष्या इत्यादि विकारों का कारण बनती है और जीव को परमात्मा से दूर करती है। विद्या रूपी शक्ति (परा विद्या) — यह शक्ति सद्गुणों का विकास करती है — सत्संग की इच्छा प्रेम भक्ति वैराग्य जिससे ईश्वरप्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। 🔹 विद्या ईश्वरत्व की अनुभूति कराकर जीव को स्वतंत्र बनाती है। 🔹 माया का अस्तित्व तब तक आवश्यक है जब तक ज्ञानरूपी फल परिपक्व न हो जाए। ● उपमा :--- फल के छिलके की भांति माया आवश्यक है, पर ज्ञानपूर्ण होने पर उसका त्याग करना ही श्रेयस्कर होता है। ❗️ ३. जीवात्मा :--- आत्मा के दो स्वरूप होते हैं :--- १. सार्वभौम आत्मा (परमात्मा) २. व्यक्तिगत आत्मा (जीवात्मा) परमात्मा स्वरूप आत्मा — अकर्ता, अभोक्ता, नित्य, शाश्वत, अजन्मा और अविनाशी है। जब यही आत्मा शरीरादि से संबंध मान लेती है तो जीवात्मा कहलाती है। 🔹 अविद्या के कारण आत्मा अपने को देहाधीन मानकर कर्ता और भोक्ता बनने का भ्रम करती है। ❗️ ४. काल (समय) :--- समय — एक सतत प्रवाहमान, अनवरत गति से चलने वाला तत्त्व है। यह सापेक्ष और परम दोनों रूपों में विद्यमान होता है। ● समय के दो रूप:--- ▪︎ पदार्थपरक समय — जैसे घड़ी में घंटे-मिनट-सेकंड ▪︎ व्यक्तिपरक समय — जैसे दुःख का समय अधिक लम्बा प्रतीत होना ● त्रिकाल स्वरूप :--- ▪︎ वर्तमान — जो अभी घट रहा है ▪︎ भूत — जो बीत चुका ▪︎ भविष्य — जो अभी नहीं आया 🔹 समय न केवल चेतन अपितु जड़ पदार्थों को भी प्रभावित करता है। 🔹 परिवर्तन, वृद्धावस्था, क्षय — सभी समय की गति के द्योतक हैं। ❗️ ५. कर्म :--- प्रकृति का समस्त संचालन कर्मनियम से होता है। जो जैसा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल भोगना पड़ता है। ● कर्म के भेद :--- १. सकाम कर्म — फल की अपेक्षा से किया गया कर्म ▪︎. सत्कर्म — जैसे पुण्य कार्य ▪︎. दुष्कर्म — जैसे पाप कार्य २. निष्काम कर्म — बिना फल की कामना से किया गया कर्म यह मोक्षदायक है ३. तटस्थ कर्म — जैसे भोजन, चलना आदि ● कर्मफल के प्रकार :--- ▪︎ संचित कर्म — पूर्व जन्मों में संचित ▪︎ प्रारब्ध कर्म — जो वर्तमान जीवन में भोगे जा रहे हैं ▪︎ क्रियमाण कर्म — वर्तमान में किए जा रहे कर्म ● कर्म के माध्यम :--- शारीरिक, मानसिक और वाचिक कर्म 🔹 मानसिक कर्म अत्यंत सूक्ष्म होते हैं और प्रबल प्रभाव उत्पन्न करते है

Comments (0)
No comments yet. Be the first to comment!
