
Rama Devi Sahu
1 day ago
आइए, उस रात को याद करते हैं, जब स्वयं परमात्मा एक बंदीगृह में रोया था... श्रीकृष्ण जन्म - वह रात जब यमुना भी ठहर गई भाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष, अष्टमी की आधी रात। मथुरा का कारागार। चारों ओर घोर अंधकार, सीलन भरी दीवारें, लोहे की मोटी जंजीरें। एक माँ है - देवकी। उसका आठवां गर्भ है। सात बार उसकी गोद उजड़ी है। कंस ने उसके सात नवजातों को उसकी आँखों के सामने शिला पर पटक कर मार दिया है। आज उसकी कोख में फिर हलचल है, और वह जानती है, यह भी जाएगा। वह रो भी नहीं पा रही, क्योंकि आंसू भी सूख गए हैं। बगल में वसुदेव हैं। हाथ-पैर बेड़ियों में, पर हाथ जोड़े हुए। बार-बार बस यही कह रहे हैं - "प्रभु, इस बार इस माँ की गोद मत उजाड़ना।" तभी कारागार में प्रकाश हुआ। ऐसा प्रकाश जैसा हजारों सूर्य एक साथ उदय हो गए हों। बेड़ियां अपने आप खुलने लगीं। पहरेदार गहरी नींद में सो गए। और उस प्रकाश के बीच, देवकी की गोद में... कोई बालक नहीं, साक्षात नारायण प्रकट हुए। चार भुजाओं में शंख, चक्र, गदा, पद्म। मोर मुकुट, पीताम्बर, गले में कौस्तुभ मणि। देवकी फूट-फूट कर रो पड़ी। बोली - "प्रभु, आप तो अंतर्यामी हैं, आपने देखा है मेरी सात संतानों को मरते हुए। इस रूप में कंस आपको देखते ही मार देगा।" वसुदेव की आंखों से अश्रुधारा बह रही थी। तभी भगवान मुस्कुराए और बोले - "माँ, आपने पिछले जन्म में सुतपा और पृश्नि के रूप में 12 हजार वर्षों तक मेरे लिए तप किया था। तब मैंने वरदान दिया था कि मैं तुम्हारा पुत्र बनूँगा। आज वो वचन पूरा करने आया हूँ।" और अगले ही क्षण, वो चतुर्भुज रूप समेट कर, एक नन्हा, घुंघराले बालों वाला, साँवला सलोना बालक बन गए। इतना सुंदर बालक कि कारागार की काल कोठरी भी वृंदावन बन गई। वो नन्हा सा बालक अपनी छोटी-छोटी मुठ्ठियां बंद किए रो रहा है - `उँआ... उँआ...` - जैसे कह रहा हो, "माँ, मुझे जल्दी यहाँ से ले चलो।" तभी आकाशवाणी हुई - "वसुदेव, इस बालक को गोकुल में नंद के घर ले जाओ। वहाँ यशोदा को एक कन्या हुई है, उसे यहाँ ले आओ।" वसुदेव ने कांपते हाथों से उस फूल से भी कोमल बालक को सूप में रखा। जैसे ही कारागार का द्वार खुला, बाहर प्रलयकारी वर्षा। यमुना अपने पूरे उफान पर। वसुदेव यमुना में उतरे। पानी गले तक आ गया। तभी उस सूप में लेटे नन्हे कन्हैया ने अपना एक नन्हा सा पैर सूप से बाहर निकाला और यमुना को स्पर्श किया। कहते हैं, जिस यमुना ने अपने पूरे जीवन में किसी के आगे सिर नहीं झुकाया, वो उस स्पर्श से दो भागों में बंट गई। और वसुदेव के लिए रास्ता बना दिया। ऊपर शेषनाग अपने फनों से उस नन्हे बालक को भीगने से बचा रहे थे। गोकुल में यशोदा मैया बेसुध पड़ी थीं। वसुदेव ने चुपके से कृष्ण को यशोदा के बगल में सुला दिया और उनकी कन्या को लेकर वापस आ गए। सुबह जब यशोदा की आँख खुली, तो देखा - बगल में एक साँवला सा बालक, मंद-मंद मुस्कुरा रहा है। यशोदा ने उसे छाती से लगा लिया। वो नहीं जानती थी कि उसने पूरे ब्रह्मांड को अपनी छाती से लगा लिया है। उधर मथुरा में जब वो कन्या कंस के हाथ से छूटी तो आकाश में दुर्गा बन कर बोली - *"अरे मूर्ख कंस, मुझे मारने से क्या होगा? तुझे मारने वाला तो गोकुल में पहुँच गया है।"* उस रात से एक माँ की सूनी गोद भर गई, और दूसरी माँ की गोद में पूरा संसार आ गया। *जय श्री कृष्ण।*
Comments (2)

Rama Devi Sahu
Sep 4, 2026
Shubha Ratri... Radhey Radhey ❤️ Mana ki Yaadon ka, Koi Chehara nhi Hota l Par Yaadon se Jyada , Kuch Gahara bhi nhi Hota ll Radhey...🙏

Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
Sep 4, 2026
जय श्री कृष्णा जी 🙏 सुप्रभात जी 🙏 जन्मआष्ट्मी की हार्दिक शुभकामनाएं जी 🙏 जय माता दी 🙏
