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मैं बज़्म में हूँ, फिर भी मुझे जानने वाला कोई नहीं, हर्फ़ बहुत हैं होंठों पे, पर पहचानने वाला कोई नहीं। ख़ामोशी का लिबास ओढ़े, बैठा हूँ मुद्दतों से, मेरे सुकूत की ज़बाँ समझने वाला कोई नहीं। ख़्वाबों के चिराग़ जलते रहे सारी-की-सारी रात, सुबह हुई तो उन्हें सहेजने वाला कोई नहीं। माँ की दुआ का साया है अब भी सर पे मगर, मेरे डर को सीने से लगाने वाला कोई नहीं। महफ़िल में मुस्कुराता हूँ, निभाता हूँ रवायतें, इस मुस्कान के पीछे का राज़ जानने वाला कोई नहीं। वक़्त मेहरबाँ भी हो जाए तो क्या हासिल, बिखर जाऊँ अगर, हाथ थामने वाला कोई नहीं। इश्क़ हो या दर्द—दोनों ही बेपनाह रहे, दिल को पनाह देने वाला आजकल कोई नहीं। अब तो इस तलाश को ही मंज़िल मान लिया मैंने, इस हुजूम-ए-शहर में मेरा साहिल कोई नहीं। 🙏 शुभप्रभात जी 🙏

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