
SHREE SHARMA
188 days ago
एक आदमी एक दिन लोटा लेकर जल भरने निकला। वह कुएं पर पहुँचा, पर उसे लगा कि तालाब कुएं से बड़ा होता है। वह तालाब गया, फिर सोचा नदी तालाब से भी बड़ी होती है। नदी पहुँचा, तो विचार आया कि समुद्र में तो अनगिनत पानी है – चलो वहीं चला जाएं, जहाँ सबसे अधिक जल हो। वह समुद्र के पास पहुँचा। वहाँ सचमुच जल ही जल था, किन्तु जब लोटा भरने की बारी आई, तो पाया कि चाहे समुद्र कितना ही बड़ा क्यों न हो, उसके लोटे में उतना ही पानी आएगा, जितना उसमें समा सके। यह लोटा भाग्य का प्रतीक था। चाहे हम कितनी भी बड़ी जगह क्यों न पहुँचें, हमारे भाग्य का पात्र उतना ही ले सकता है, जितना उसमें समाने की क्षमता है। तुलसीदास जी भी कहते हैं: "जहाँ-जहाँ जाए तुलसी, सरिता, कूप, समुद्र। जल बूंद न अधिक समाय, मिलि ही रहै दुर्बुद्ध।" अब सवाल उठता है – जब हमें उतना ही मिलेगा जितना भाग्य में लिखा है, तो फिर भगवान को मानने की जरूरत क्या है? तर्क कहता है – जब कर्म से ही भाग्य बनता है और भाग्य से ही फल मिलता है, तो फिर भगवान क्यों? इसका उत्तर महापुरुषों ने बहुत सुंदर ढंग से दिया है। उत्तर यह है कि कर्म का फल तो अवश्य मिलता है, पर कर्म स्वयं फल देने में सक्षम नहीं है। अगर आपको कथा संग्रह की पोस्ट पसंद आती है तो आज ही सब्सक्राइब करें कथा संग्रह उदाहरण लो – एक छात्र ने मेहनत से पढ़ाई की, डिग्रियाँ लीं। पर क्या सिर्फ डिग्री से नौकरी मिलती है? नहीं। जब कोई संस्था उसकी योग्यता को स्वीकार करती है, तभी उसे नौकरी मिलती है। यानि पढ़ाई तो कर्म है, पर फल तभी मिलता है जब कोई उसका मूल्य स्वीकार करे। ठीक वैसे ही, भगवान हमारे कर्मों को स्वीकार कर के ही हमें उनका फल देते हैं। अब सोचो – दुनिया का मालिक, ईश्वर, जिसे हमारे कर्म की कोई आवश्यकता नहीं है, वह फिर भी हमारे छोटे-छोटे कर्मों को स्वीकार कर हमें उसका फल देता है। यही उसका अनंत करुणा और कृपा है। इसीलिए हमें भगवान को मानना चाहिए। अब एक और घटना सुनो – संत तुकाराम जी को एक व्यक्ति ने अपने खेत की रखवाली का जिम्मा सौंपा। पर फसल के समय देखा गया कि खेत में कुछ बचा ही नहीं। गुस्से में वह व्यक्ति तुकाराम जी से फसल की भरपाई मांगने लगा। तुकाराम जी ने शांत स्वर में कहा– "कटवाओ खेत।" लोगों ने हँसी उड़ाई– "अब इसमें तिनका भी नहीं है, देंगे कहां से?" पर जब खेत कटा, तो आश्चर्य! खेत के अंदर ढेर सारी फसल निकली। सबने देखा कि जहां कुछ भी न था, वहाँ भगवान की कृपा से भरपूर अनाज था "पूरे 25 मन"। ऐसी ही एक घटना– तुकाराम जी एक बार गन्ने बेचने निकले। सारे गन्ने रास्ते में गोपाल को खिला दिए। जब घर पहुँचे, सिर्फ एक गन्ना बचा। पत्नी को क्रोध आया और वही गन्ना तुकाराम जी की पीठ पर मार दिया। दो टुकड़े हो गए। तुकाराम जी मुस्कराए और बोले – "अब हमारे पास दो गन्ने हैं, एक तुम खाओ, एक मैं।" किसी ने पूछा- "आप नाराज़ क्यों नहीं हुए?" तुकाराम बोले: "अगर पत्नी अनुकूल होती, तो मन संसार में लग जाता। प्रतिकूल मिली है, इसलिए मन भगवान में लगा है।" नरसी मेहता की पत्नी का निधन हुआ, तो वे बोले – "भगवान की बड़ी कृपा है।" इन सब संतों ने विपरीत परिस्थितियों में भी भगवान की कृपा देखी। तो हम क्यों नहीं देख सकते? हर रोज सोचो- मिला क्या है? और जो भी मिला है, सोचो– किसने दिया है? परिवार, शरीर, धन, स्वास्थ्य- यह सब हमारा नहीं, ईश्वर की ही देन है। इसलिए भगवान को मानो- सिर्फ इसलिए नहीं कि डर है, बल्कि इसलिए कि वो बिना जरूरत हमारे कर्मों को स्वीकार करता है- और हमें फल देता है। यही उसकी सच्ची कृपा है। जय जय श्री राधे

Comments (2)

Pannalal Chouhan
Feb 23, 2026
ॐ नमः शिवाय

Mayank S
Feb 23, 2026
Jai shree mahakal 🙏
