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**🌟 पहले तारे की लीला 🌟** वृंदावन में संध्या उतर रही थी। सूर्य अपनी सुनहरी किरणें समेटकर धीरे-धीरे क्षितिज के पीछे जा रहा था। आकाश गुलाबी, केसरिया और नीले रंगों से सजा हुआ था। गायें लौट रही थीं और यमुना के तट पर शीतल हवा बह रही थी। उसी समय नन्हे कान्हा अपने सखाओं के साथ खेलते-खेलते आकाश की ओर देखने लगे। अचानक उनकी चमकती आँखों ने संध्या के आकाश में पहला तारा देख लिया। आनंद से भरकर उन्होंने अपनी छोटी उँगली उस ओर उठाई और मुस्कुराते हुए पुकारा, “देखो! सबसे पहले तारा मैंने ढूँढ़ लिया!” सखा उत्सुकता से कान्हा के पास दौड़ आए। सभी ने ऊपर देखा तो सचमुच एक उज्ज्वल तारा टिमटिमा रहा था। कान्हा की मधुर हँसी गूँज उठी और सब सखा भी प्रसन्न होकर उस तारे को निहारने लगे। उस क्षण ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वह तारा भी कान्हा के दर्शन पाकर और अधिक चमकने लगा हो। वृंदावन की संध्या, सखाओं का प्रेम और कान्हा की निष्कलुष मुस्कान मिलकर एक अद्भुत दिव्य लीला का रूप ले चुके थे। **भावार्थ:** जो सबसे पहले ईश्वर की ओर दृष्टि उठाता है, उसके जीवन में भी आशा और प्रकाश का पहला तारा चमक उठता है। ✨🙏🌙

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