
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
169 days ago
14.3.2026 *"जब लोग आपस में बातें करते हैं, तो शुद्ध मन के लोग बहुत कम मिलते हैं, जो ढंग से दूसरे व्यक्ति की बात को समझते एवं स्वीकार करते हैं।और सीधा-सीधा सही उत्तर देते हैं।"* *"अधिकांश लोग तो अपनी बात ऊंची रखना चाहते हैं, दूसरे की बात को काटना चाहते हैं। जैसे तैसे करके अपने को जिताना और दूसरे को हराना चाहते हैं। इसलिए वे दूसरे व्यक्ति की बात को शुद्ध मन से नहीं सुनते।" "प्रायः इस दृष्टि से सुनते हैं कि मुझे इसकी बात काटनी है, इसको हराना है, या इसको अपमानित करना है। यह भावना अच्छी नहीं है।"* *"अपने मन को शुद्ध करें। दूसरे व्यक्ति की बात को शांति से ध्यान पूर्वक सुनें। उसके अभिप्राय को ईमानदारी से समझें। और यदि ठीक हो, तो उसे स्वीकार भी करें। यदि उसके अभिप्राय में कुछ कमी हो, या गलती हो, तभी उसका खंडन करें, अन्यथा नहीं।"* *"और जो खंडन भी करें, तो उसकी गलती को सुधारने की भावना से करें, न कि उसे हराने या अपमानित करने की भावना से। यही सभ्यता है, यही धर्म है।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*

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