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कितनी गहरी और सत्य बात कही है महाराज जिने। जब हृदय सांसारिक इच्छाओं और 'मोह-माया' के शोर से मुक्त हो जाता है, तभी वहां उस परम शक्ति की शांति का अनुभव होता है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे शांत जल में ही चंद्रमा का स्पष्ट प्रतिबिंब दिखाई देता है; अगर पानी में हलचल (इच्छाएं) हो, तो छवि धुंधली हो जाती है। इस विचार को और अधिक स्पष्ट करने के लिए कुछ बिंदु साझा कर रहा हूँ: * निस्वार्थ भाव: जहाँ "मैं" और "मेरा" समाप्त होता है, वहीं से आध्यात्मिकता की शुरुआत होती है। * संतुष्टि: जिसके पास जो है उसमें संतोष है, उसे बाहर कुछ खोजने की आवश्यकता नहीं पड़ती। * शुद्ध अंतःकरण: कबीर दास जी ने भी कहा है, "जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं"—अर्थात अहंकार और ईश्वर एक साथ नहीं रह सकते। राधे राधे जी 🙏 शुभरात्री जी 🙏

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