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यह मनमोहक दृश्य गुजरात के मेहसाणा (उंझा) में स्थित माँ अन्नपूर्णा के भव्य मंदिर का है। इस प्रतिमा में देवी पार्वती के अन्नपूर्णा स्वरूप और देवाधिदेव महादेव की एक अत्यंत पावन और दुर्लभ पौराणिक घटना को दर्शाया गया है। **पौराणिक प्रसंग (भगवान शिव द्वारा भिक्षा माँगना):** पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती के बीच संसार और प्रकृति को लेकर संवाद हुआ। शिवजी ने कहा कि यह संपूर्ण भौतिक संसार, भोजन और पदार्थ केवल एक भ्रम (माया) हैं, केवल आत्मा ही सत्य है। माता पार्वती, जो प्रकृति और पोषण का मूल स्वरूप हैं, को लगा कि यदि भोजन को केवल भ्रम मान लिया जाए तो सृष्टि का संचालन असंभव हो जाएगा। अपनी बात सिद्ध करने और सृष्टि को भोजन का महत्व समझाने के लिए माता पार्वती संसार से अंतर्ध्यान हो गईं। उनके अंतर्ध्यान होते ही पूरी पृथ्वी पर भीषण अकाल पड़ गया। नदियाँ सूख गईं, वनस्पतियाँ नष्ट हो गईं और सभी जीव-जंतु, मनुष्य व देवता अन्न-जल के बिना तड़पने लगे। तब माता पार्वती को प्राणियों पर दया आई और उन्होंने काशी में 'माँ अन्नपूर्णा' के रूप में प्रकट होकर एक विशाल अन्नक्षेत्र शुरू किया। संसार के कल्याण और सभी जीवों की क्षुधा शांत करने के लिए, भगवान शिव स्वयं एक भिक्षुक का रूप धारण कर हाथ में खप्पर (भिक्षा पात्र) लेकर माता अन्नपूर्णा के द्वार पर पहुँचे। उन्होंने माता से भिक्षा माँगी और स्वीकार किया कि यद्यपि आत्मा सत्य है, परंतु शरीर को जीवित रखने और सृष्टि के संतुलन के लिए 'अन्न' ही ब्रह्म है। माता अन्नपूर्णा ने प्रसन्न होकर शिवजी को भिक्षा दी और पूरी पृथ्वी से अकाल समाप्त हो गया। **प्रतिमा और मंदिर की विशेषताएँ:** * **भव्य स्वरूप:** चित्र में माता अन्नपूर्णा स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान हैं। उनके एक हाथ में अन्न/खीर से भरा पात्र और दूसरे हाथ में स्वर्ण करछी (कलछी) सुशोभित है, जिससे वे स्नेहपूर्वक भोजन परोस रही हैं। * **शिवजी का भिक्षुक रूप:** देवाधिदेव महादेव स्वयं विनम्र भाव से हाथ में भिक्षा पात्र लिए खड़े हैं, जो यह दर्शाता है कि पोषण और प्रकृति के आगे सभी एक समान हैं। * **धार्मिक मान्यता:** ऐसा माना जाता है कि माता अन्नपूर्णा के इस स्वरूप के दर्शन करने से घर में कभी धन-धान्य और अन्न की कमी नहीं होती तथा साधक को आत्मिक शांति प्राप्त होती है।

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