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माता पार्वती और उनके वाहन (सिंह/शेर) की कहानी बहुत ही रोचक है। यह कहानी मुख्य रूप से माता के तप, क्रोध और वात्सल्य से जुड़ी है। यहाँ बताया गया है कि वह शेर, जो माता को अपना आहार बनाने आया था, उनका परम भक्त और वाहन कैसे बना: 1. देवी पार्वती का कठोर तप पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब माता पार्वती भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए हिमालय पर कठोर तपस्या कर रही थीं, तब वे वर्षों तक एक ही स्थान पर ध्यानमग्न बैठी रहीं। उनकी तपस्या की ऊर्जा इतनी तीव्र थी कि आसपास का वातावरण पूरी तरह बदल गया था। 2. भूखा शेर और माता का तेज उसी समय एक अत्यंत भूखा शेर वहां पहुंचा। वह माता पार्वती को अकेला देखकर उन्हें अपना भोजन बनाने के विचार से वहां रुका। लेकिन जैसे ही वह माता के पास पहुंचा, वह उनके दिव्य तेज और तपस्या के प्रभाव से वहीं जड़ (स्तब्ध) होकर बैठ गया। * प्रतीक्षा: वह शेर इस इंतजार में बैठा रहा कि कब देवी अपनी तपस्या पूरी करेंगी और कब वह उन्हें खाएगा। * संगत का असर: वर्षों तक माता के पास शांत भाव से बैठने के कारण, उस शेर के भीतर का हिंसक स्वभाव समाप्त हो गया और वह भी एक तरह से माता के साथ तपस्या में ही लीन हो गया। 3. 'माता' और 'पुत्र' का संबंध जब माता पार्वती की तपस्या पूरी हुई और भगवान शिव प्रकट हुए, तो माता ने देखा कि वह शेर भी उन्हीं की तरह धूल से ढका हुआ और कमजोर हो गया है, क्योंकि वह भी वर्षों से भूखा प्यासा केवल माता को देख रहा था। माता पार्वती उस शेर की तपस्या और धैर्य से अत्यंत प्रसन्न हुईं। उन्होंने उसे अपना भोजन बनाने के बजाय अपना पुत्र तुल्य भक्त माना। उन्होंने कहा: > "जिस प्रकार मैंने तपस्या की, उसी प्रकार इस जीव ने भी मेरे सानिध्य में रहकर अनजाने में ही सही, पर कठिन तप किया है। अतः अब से यह मेरा 'वाहन' कहलाएगा।" > 4. प्रतीकात्मक अर्थ (Symbolism) अध्यात्म में यह माना जाता है कि शेर 'क्रोध' और 'अहंकार' का प्रतीक है। जब माता पार्वती (शक्ति) उस पर सवारी करती हैं, तो इसका अर्थ है कि उन्होंने अपने क्रोध और अहंकार को वश में कर लिया है। वह हिंसक पशु अब शक्ति का सेवक बन चुका है। यही कारण है कि माता पार्वती के लगभग सभी रूपों (दुर्गा, अम्बे) में शेर उनके साथ गर्व से खड़ा रहता है जय माता दी 🚩 🙏💫

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