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दोस्ती का नाम लेकर जो ख़ंजर चलाते रहे, हम ज़िंदा लाश बनते रहे, तुम मज़े उड़ाते रहे। काजल की तरह आँखों में रहकर भी ज़हर निकले, इतने क़रीब थे तुम, फिर भी दूरियाँ बढ़ाते रहे। नाम दिया रिश्ते को, निभाने से भागते रहे, हम फ़र्ज़ ओढ़ते रहे, तुम फ़र्ज़ को रौंदते रहे। दर्द को मेरा तमाशा बनाया महफ़िलों में, और कहते हो हम दोस्त हैं—वाह, कितने शरीफ़ बनते रहे। नज़रअंदाज़ी तुम्हारी भूल नहीं, फितरत है, हम टूट-टूट कर चुप रहे, तुम आदतें सजाते रहे। क़दर को तुमने समझा कमज़ोरों की बीमारी, हम मान देते रहे, तुम औक़ात गिनाते रहे। जब हाथ थामने का वक़्त आया, तुम हँस के हट गए, और ज़रूरत के बाद हमसे हाल पूछते रहे। ईमान, वफ़ा, क़सम—सब लफ़्ज़ों की लाशें थीं, असली वक़्त में तुम हर मोर्चे से भागते रहे। दोस्ती नहीं थी ये, एक साज़िश थी ख़ामोश, जहाँ हम भरोसा करते रहे, तुम क़ब्रें खोदते रहे। दुश्मन सामने होता तो ज़ख़्म साफ़ होता, यहाँ दोस्त बनकर तुम सीने में सुराख़ करते रहे। अब दोस्ती का नाम न लो, ये लफ़्ज़ शर्मिंदा है, तुम जैसे लोगों की वजह से रिश्ते मरते रहे। हम बचे तो सिर्फ़ इसीलिए कि सब सह गए, वरना तुम तो जीते-जी इंसान क़त्ल करते रहे। 🙏 शुभप्रभात जी 🙏

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