
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
181 days ago
2.3.2026 छोटे न्यायालय के निर्णय को उच्च या सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है, कि वह निर्णय ठीक नहीं हुआ, और सही निर्णय यह है। जैसे सांसारिक न्यायालय में यह व्यवस्था चलती है। ऐसे ही यह भी समझना चाहिए कि *"सांसारिक सर्वोच्च न्यायालय से ऊपर एक और ऊंचा न्यायालय है, जो ईश्वर का है। वह उच्चतम न्यायालय है। वह अंतिम न्यायालय है। वहां जो निर्णय होता है, वह सदा सही ही होता है। क्योंकि वहां का न्यायाधीश स्वयं ईश्वर है।"* *"ईश्वर सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान और पूर्ण न्यायकारी पक्षपात रहित न्यायाधीश है। इसलिए वहां कभी अन्याय नहीं होता। उसका न्याय सबको स्वीकार करना ही पड़ता है।" "चाहे कोई यहां का राजा हो, या किसी अन्य देश का राजा हो, या किसी भी सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश हो, ईश्वर उससे भी बड़ा न्यायाधीश है।"* *"तो जैसे सर्वोच्च न्यायालय के सामने छोटे न्यायालय का निर्णय नहीं चलता। ऐसे ही ईश्वर के उच्चतम न्यायालय के सामने किसी भी मनुष्य राजा या न्यायाधीश का निर्णय नहीं चलता। अंतिम निर्णय ईश्वर का ही मान्य होता है।" "इसलिए ईश्वर के संविधान का ज्ञान अवश्य करें। उसके नियमों का पालन अवश्य करें। यदि आप ईश्वर के संविधान का पालन नहीं करेंगे, तो वह पक्षपात रहित ईश्वर अपने न्याय नियमों के अनुसार आपका भी न्याय कर देगा, और तब उसके न्यायालय में आपको भारी दंड भोगना पड़ेगा।"* *"ईश्वर का संविधान चार वेदों में लिखा है। फिर ऋषियों ने वेदों को पढ़कर अपने ग्रंथों में उसे और सरल भाषा में समझाया है। अतः यदि आप वेदों को पढ़ें या ऋषियों के ग्रंथों को पढ़ें, तो आपको ईश्वर का संविधान ठीक-ठाक समझ में आ सकता है। फिर आप उसका पालन कर सकते हैं, और सुखी जीवन जी सकते हैं। तथा ईश्वर के दंड से भी बच सकते हैं।"* कहने का सार यह हुआ कि *"या तो ईश्वर के संविधान का पालन कर लें, तब तो ईश्वर आपको सुख देगा। अन्यथा ईश्वर के न्यायालय से भारी दंड भोगने की तैयारी कर लें।" "आपके सामने ये दो रास्ते हैं। इनमें से जो आपको अच्छा लगे, उस पर चलें।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*

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