
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
124 days ago
28.4.2026 व्यक्ति चाहता है, *"मैं सदा सुखी रहूं।"* और वह सुख के लिए नए-नए उपाय भी खोजता रहता है। इस खोज में वह बहुत बार गलतियां भी करता है। *"जो सुख के उपाय नहीं होते, उन्हें वह सुख का उपाय मानकर भारी भूलें करता है। फिर अंत में दुखी होता है।"* आजकल बहुत से युवक यह सोचते हैं, कि *"हम भारत में 12 कक्षा तक पढ़कर आगे पढ़ने के लिए विदेश जाएंगे। और वहां अच्छी पढ़ाई करके अच्छे पैसे कमाएंगे, खाएंगे पिएंगे मौज करेंगे।"* ऐसा सोचकर वे विदेश या भारत देश में ही, परिवार से कहीं दूर चले जाते हैं। अपने सुख-दुख के साथी परिवार के लोगों को, मित्रों और संबंधियों को छोड़ जाते हैं। 5-7 वर्ष वे विदेश में या बंगलौर मंगलौर आदि किसी दूर स्थान पर पढ़ाई करते हैं। कुछ काम धंधा करते हैं। धीरे-धीरे वहीं सेट हो जाते हैं। परंतु उनके माता-पिता मित्र और संबंधी लोग भारत में रहते हुए भी उनसे अलग हो जाते हैं। फिर वे युवक विदेश में रहते हुए ऐसा मान लेते हैं, कि बस यही जीवन है, और ऐसे ही जीना है। वे भूल जाते हैं कि *"हम पर हमारे माता-पिता का परिवार जनों का मित्रों का संबंधियों का और पूरे देश के लोगों का कोई ऋण भी है। हमने 18-20 साल तक अपने माता-पिता और भारत देश वालों की सेवाएं ली। उनका पैसा खर्च करवाया। अनाज फल फूल शाक सब्जी रोटी कपड़ा मकान रेल सड़क विमान आदि की सारी सुविधाएं भोगी। और आज जब कुछ उन्हें वापस प्रतिफल देने का समय आया, तो हम भाग कर विदेश आ गए।"* ये बातें उनको समझ में नहीं आती। *"न तो विदेश में उन्हें माता-पिता और परिवार का सुख मिलता, और न ही वहां के लोगों की सहानुभूति। क्योंकि वे तो वहां विदेशी हैं। विदेशी होने के कारण वहां तो वे द्वितीय स्तर का नागरिक बनकर रहते हैं। इस प्रकार से उनका आत्म सम्मान तक खो जाता है।"* जब माता-पिता की वृद्धावस्था में उन पर कोई समस्या आती है, तो वे इतनी दूर रहकर उसका समाधान नहीं कर पाते। *"परिणाम यह होता है कि वे युवक विदेश में दुखी रहते हैं और उनके माता-पिता भारत में। वृद्धावस्था में भी उन्हें कोई प्रेम से भोजन खिलाने वाला नहीं होता। रोगी होने पर कोई डॉक्टर से दवा लाने वाला नहीं होता। कोई सेवा करने वाला नहीं होता।"* तब वे माता-पिता पश्चाताप की अग्नि में जलते रहते हैं, कि *"हमने अपने बच्चों को विदेश क्यों भेजा?"* विदेश में रहने वाले बच्चे कभी-कभी ऐसा अनुभव करते हैं, कि *"हमने भारत देश और अपने माता-पिता को छोड़कर भारी गलती की है।" "परंतु फिर भी वे वहां के वातावरण में ऐसे जकड़ जाते हैं, कि चाह कर भी भारत वापस नहीं लौट पाते, और अपने माता-पिता एवं परिवार मित्रों आदि के साथ रहकर सुख नहीं भोग पाते, और न ही माता-पिता आदि की सेवा कर पाते।" "जो लोग ऐसी गलती कर चुके हैं, वे तो कर ही चुके हैं। कम से कम और लोग तो इन बातों से शिक्षा लेकर आगे ऐसी गलतियां न करें।"* भारत में ही, अपने माता-पिता के पास रहकर अपना जीवन सुखपूर्वक बिताएं। माता-पिता भी इस प्रकार से सोचें। *"भले ही हमारे बच्चे कम पढ़ें, पैसा कम कमाएं, परंतु हमारे साथ रहें।* इसी में उन बच्चों का और परिवार का सुख है।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़ गुजरात।"*

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