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रानी की वाव (Rani ki Vav) भारत के गुजरात राज्य के पाटन में स्थित एक बेहद भव्य और अनूठी बावड़ी है। इसे "उल्टा मंदिर" इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसकी बनावट किसी मंदिर की तरह ही भव्य है, लेकिन यह जमीन के ऊपर होने के बजाय गहराई में बनी हुई है। यहाँ इस ऐतिहासिक धरोहर की कुछ खास बातें दी गई हैं: 1. निर्माण और इतिहास * निर्माण: इसका निर्माण 11वीं शताब्दी (लगभग 1063 ईस्वी) में सोलंकी राजवंश की रानी उदयमति ने अपने पति राजा भीमदेव प्रथम की याद में करवाया था। * संरक्षण: सरस्वती नदी में आई बाढ़ के कारण यह बावड़ी सदियों तक गाद (silt) के नीचे दबी रही, जिसकी वजह से इसकी नक्काशी आज भी बहुत सुरक्षित और स्पष्ट दिखाई देती है। 2. वास्तुकला की विशेषता (उल्टा मंदिर) इसे मारू-गुर्जर स्थापत्य शैली में बनाया गया है। अगर आप इसे ध्यान से देखें, तो यह एक उल्टे पिरामिड या मंदिर जैसा दिखता है: * यह सात मंजिला गहरी है और लगभग 64 मीटर लंबी, 20 मीटर चौड़ी और 27 मीटर गहरी है। * इसमें सीढ़ियों की एक पूरी श्रृंखला है जो नीचे पानी के कुंड तक जाती है। * इसकी दीवारों और स्तंभों पर 800 से अधिक मुख्य मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। 3. अद्भुत नक्काशी और मूर्तियां बावड़ी की दीवारों पर हिंदू धर्म के विभिन्न रूपों का चित्रण है: * भगवान विष्णु के अवतार: यहाँ विष्णु जी के दशावतारों (जैसे राम, कृष्ण, वराह, नरसिंह) की सुंदर मूर्तियां हैं। * शेषशायी विष्णु: सबसे निचले स्तर पर विष्णु जी की शेषनाग पर लेटी हुई प्रतिमा है। * अन्य आकृतियां: यहाँ अप्सराओं, ऋषियों, ब्राह्मणों और देवी-देवताओं की नक्काशी के साथ-साथ उस समय के आभूषणों और वस्त्रों की बारीकियों को भी दिखाया गया है। 4. वैश्विक पहचान * UNESCO: इसे 2014 में यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया था। * भारतीय मुद्रा: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने इसकी महत्ता को देखते हुए ₹100 के नए नोट के पीछे रानी की वाव का चित्र अंकित किया है। > एक रोचक तथ्य: प्राचीन समय में इस बावड़ी का उपयोग न केवल जल संचयन के लिए होता था, बल्कि यह सामाजिक मेल-जोल और आध्यात्मिक शांति का केंद्र भी थी। इसकी गहराई में तापमान ऊपर की तुलना में 4-5 डिग्री कम रहता है। >

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