
SHREE SHARMA
6 hours ago
क्या आप जानते हैं कि हमारे कैलेंडर के 12 महीनों के नाम असल में 27 सगी बहनों की एक शापित कहानी से जुड़े हैं? सृष्टि के आरंभ में जब काल, ऋतुओं और समय के विभाजन की रचना हो रही थी, तब आकाश मंडल में न तिथियों का कोई स्पष्ट नियम था और न ही महीनों का कोई निश्चित नाम। उस समय ब्रह्मांड के संचालन के लिए एक ऐसी लीला घटी जिसने खगोल, भक्ति और काल-गणना को एक सूत्र में बांध दिया। यह गाथा है प्रजापति दक्ष, 27 नक्षत्र-कन्याओं, चंद्र देव के अहंकार और भगवान शिव के सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की। ब्रह्मा जी के मानस पुत्र प्रजापति दक्ष की 27 अत्यंत रूपवती और गुणवान कन्याएं थीं। जब वे विवाह योग्य हुईं, तो दक्ष ने संपूर्ण ब्रह्मांड में उनके योग्य वर की खोज की। उस काल में महर्षि अत्रि और देवी अनुसूया के पुत्र चंद्र देव (सोम) अपने दिव्य रूप, शीतल कांति और तेज के लिए विख्यात थे। दक्ष ने चंद्र देव के समक्ष प्रस्ताव रखा कि वे उनकी सातों-बीसों (27) कन्याओं को अपनी पत्नियों के रूप में स्वीकार करें। विवाह से पूर्व प्रजापति दक्ष ने चंद्र देव से एक दृढ़ वचन लिया: "हे सोम! मेरी ये सभी 27 पुत्रियां तुम्हारे लिए समान हैं। तुम्हें वचन देना होगा कि तुम किसी एक के प्रति पक्षपात नहीं करोगे और सभी के साथ समभाव व समान प्रेम का निर्वाह करोगे। चंद्र देव ने सहर्ष यह प्रतिज्ञा स्वीकार कर ली और 27 कन्याओं—अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती—के साथ उनका विवाह संपन्न हुआ। परंतु विवाह के पश्चात स्थिति बदल गई। 27 बहनों में रोहिणी रूप और लावण्य में सबसे अद्वितीय थीं। चंद्र देव रोहिणी के आकर्षण में इस प्रकार बंधे कि वे अपना अधिकांश समय केवल उन्हीं के महल में बिताने लगे। शेष 26 पत्नियों की उपेक्षा होने लगी। वे चंद्र देव के विरह और अपमान में दिन काटने लगीं। कई वर्षों तक जब चंद्र देव के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आया, तब दुखी होकर 26 बहनें अपने पिता प्रजापति दक्ष के पास पहुँचीं और रोते हुए अपनी व्यथा सुनाई। दक्ष ने पहले तो चंद्रमा को प्रेम से समझाया: दांपत्य में न्याय सबसे बड़ा धर्म है। तुमने पक्षपात न करने की प्रतिज्ञा की थी, इसलिए अपनी सभी पत्नियों को समान समय दो। चंद्रमा ने सिर झुकाकर बात सुनी, किंतु काम और रूप के वशीभूत होकर वे फिर से रोहिणी के ही कक्ष में लौट गए और अन्य पत्नियों की निरंतर उपेक्षा करते रहे। जब दक्ष को यह ज्ञात हुआ, तो उनका पितृ-हृदय क्रोध से प्रज्वलित हो उठा। वे सीधे चंद्र देव के सम्मुख पहुंचे और बोले: "तुमने मेरे दिए उपदेश का उपहास उड़ाया है और अपनी मर्यादा भंग की है। जिस रूप और कांति के अभिमान में तुम इतने अंधे हो गए हो कि धर्म भूल गए, मैं तुम्हें शाप देता हूँ कि तुम्हारा यह रूप और कांति तुरंत नष्ट हो जाए। तुम इसी क्षण से 'क्षय रोग' से ग्रसित हो जाओगे और तुम्हारा अस्तित्व धीरे-धीरे क्षीण होकर समाप्त हो जाएगा! दक्ष का शाप अचूक था। चंद्रमा की श्वेत धवल किरणें मलीन पड़ने लगीं। उनका तेज हर दिन घटने लगा। वे सूखकर दुर्बल होने लगे। चंद्रमा के क्षीण होते ही पूरी सृष्टि में हाहाकार मच गया। औषधियां अपना रस खोने लगीं, समुद्र का ज्वार-भाटा थमने लगा, वनस्पतियों की वृद्धि रुक गई और पृथ्वी पर अकाल व अंधकार का भय छा गया। घबराए हुए चंद्र देव देवराज इंद्र और अन्य देवताओं के साथ अपने पितामह ब्रह्मा जी की शरण में पहुंचे। ब्रह्मा जी ने कहा: "प्रजापति दक्ष का शाप निष्फल नहीं हो सकता। परंतु यदि तुम आशुतोष भगवान शिव की शरण में जाओ, तो वही काल और मृत्यु से तुम्हारी रक्षा कर सकते हैं। सौराष्ट्र (गुजरात) के समुद्र तट पर स्थित 'प्रभास क्षेत्र' जाओ और वहां मृत्युंजय महादेव की आराधना करो। चंद्र देव प्रभास क्षेत्र पहुंचे। उन्होंने वहां बालू का एक पार्थिव शिवलिंग स्थापित किया और घोर तपस्या में लीन हो गए। वे छह माह तक निराहार रहकर महामृत्युंजय मंत्र (त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्...) का अखंड जप करते रहे। चंद्रमा की देह का लगभग पूरा तेज समाप्त हो चुका था, वे केवल एक महीन रेखा के समान बचे थे। उनकी अनन्य भक्ति और पश्चाताप देखकर देवाधिदेव महादेव प्रकट हुए। शिवजी ने कहा, "वत्स सोम! तुम्हारा पश्चाताप पूर्ण हुआ। वर मांगो चंद्रमा ने

Comments (5)

R k jangid phulera Jaipur
Sep 28, 2026
ओम नमः शिवाय🌿🚩🌹🙏

सविता
Sep 28, 2026
"ना आदि ना अंत है उसका, वो सबका न अंतर्यामी है, भस्म से जिसका श्रृंगार है, वो मेरा भोला स्वामी है।"

प्रेम कुमार
Sep 28, 2026
🌹हर हर महादेव 🌹 शुभ प्रभात वंदन 🌹🌹
