
SHREE SHARMA
402 days ago
भगवान् विष्णु की शिवोपासना 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️ एक समय की बात है, दैत्य प्रबल होकर सभी लोगों को पीड़ा देने और धर्म का लोप करने लगे। इससे व्यथित होकर देवगण भगवान् विष्णु के समीप पहुँचे। श्रीहरि ने पूछा–‘देवताओ! इस समय तुम्हारे आने का क्या कारण है ? मैं तुम लोगों के किस काम आ सकता हूँ ? निःसंकोच होकर तुम लोग अपनी समस्या बताओ।’ देवताओं ने कहा–‘हे देवरक्षक हरि! हम लोग इस समय दैत्यों के अत्याचार से अत्यन्त दुखी हैं। शुक्राचार्य की सलाह और तपस्या के बल से वे प्रबल हो गये हैं। हम सभी देवता उन पराक्रमी दैत्यों के सामने विवश होकर उनसे परास्त हो गये हैं। स्वर्ग पर भी उन अत्याचारियों का राज्य हो गया है। इस समय आप ही हमारे रक्षक हैं। इसलिये हम आपकी शरण में आये हैं। हे देवेश! आप हमारी रक्षा करें।’ भगवान् विष्णु बोले–‘देवताओ! हम सभी के रक्षक महेश्वर शिव हैं। उन्हीं की कृपा से मैं धर्म की स्थापना तथा असुरों का विनाश करता हूँ। तुम लोगों का कष्ट दूर करने के लिये भी मैं उन्हीं सर्वलोकमहेश्वर की उपासना करूँगा। मुझे विश्वास है कि वे परम दयालु शिव अवश्य प्रसन्न होंगे और तुम लोगों का दुःख दूर करने के लिये वे कोई-न-कोई मार्ग भी ढूँढ़ निकालेंगे।’ देवताओं से ऐसा कहकर श्रीहरि महादेव की उपासना करने के लिये कैलास गये। वहाँ पहुँचकर वे विधि पूर्वक भूतभावन भगवान् शिव की आराधना करने लगे। वे नित्य हजार नामों से महेश्वर शिव की स्तुति करते तथा प्रत्येक नामोच्चारण के साथ एक-एक कमल-पुष्प अपने आराध्य को अर्पित करते। इस प्रकार भगवान् विष्णु की यह शिवोपासना सहस्त्र दिव्य वर्षों तक निर्बाध चलती रही। एक दिन परमात्मा शिव ने विष्णु की भक्ति की परीक्षा लेनी चाही। भगवान् विष्णु नित्य की तरह एक सहस्र कमल पुष्प शिवजी को अर्पित करने के लिये लेकर आये। लीलाधारी महादेव ने उसमें से एक कमल-पुष्प कहीं छिपा दिया। शिव की माया के द्वारा घटित इस घटना का पता श्रीहरि को भी नहीं लगा। उन्होंने गिनती में एक कमल पुष्प कम पाकर उसकी खोज आरम्भ की। पूरी पृथ्वी का भ्रमण कर लिया, परन्तु कहीं भी उन्हें वह कमल पुष्प नहीं मिला। तदनन्तर दृढ़व्रत का पालन करने वाले भगवान् विष्णु ने अपना एक कमलवत् नेत्र ही उस कमल पुष्प के स्थान पर शिवार्पित कर दिया। श्रीहरि के इस अद्भुत त्याग से महेश्वर तत्काल प्रसन्न हो गये और प्रकट होकर बोले–‘विष्णु ! मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ। इच्छानुसार वर माँगो। मैं तुम्हारी प्रत्येक कामना पूरी करूँगा। तुम्हारे लिये मेरे पास कुछ भी अदेय नहीं है।’ भगवान् विष्णु ने कहा–‘नाथ! आपसे मैं क्या कहूँ ? आप तो स्वयं अन्तर्यामी हैं। संसार की कोई बात आपसे छिपी नहीं है। आप सब कुछ जानते हैं। फिर भी अगर मेरे ही मुख से सुनना चाहते हैं, तो सुनिये। प्रभो! दैत्यों ने सम्पूर्ण संसार को दुखी कर रखा है। धर्म की मर्यादा नष्ट हो गयी है। अतः धर्म की स्थापना एवं साधु-संरक्षण के लिये दैत्यों का वध आवश्यक है। मेरे अपने अस्त्र-शस्त्र उन दैत्यों के विनाश में असमर्थ हैं। इसीलिये मैं आपकी शरण में आया हूँ।’ भगवान् विष्णु की विनती सुनकर देवाधिदेव शिव ने उन्हें अपना सुदर्शन चक्र दिया। उस दिव्य चक्र के द्वारा श्रीहरि ने बिना किसी श्रम के समस्त प्रबल दैत्यों का संहार कर डाला। सम्पूर्ण जगत् का संकट समाप्त हो गया। देवता सुखी हो गये। इस प्रकार भगवान् विष्णु को सुदर्शन चक्र के रूप में एक दिव्य आयुध की प्राप्ति हो गयी। हर हर महादेव 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️#〰️〰️🌼

Comments (3)

Saumya Sharma
Jul 24, 2025
very nice post 👌👌👌👍

Saumya Sharma
Jul 24, 2025
हर हर महादेव 🙏🌹🙏 जय श्री लक्ष्मीनारायण जी 🙏 🌹🙏शुभ रात्रि वंदन भैया जी 🙏 🌹😊 ईश्वर की कृपा से आप सपरिवार सदैव स्वस्थ और खुश रहें 🙏🌹😊 आने वाला दिन आपके लिए शुभ व मंगलमय हो 🙏🌹😊

Anup Kumar Sinha
Jul 24, 2025
हर हर महादेव 🙏🙏
