
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
16 hours ago
🙏 मन सच में प्रफुल्लित नहीं, भीतर तक शांत हो गया। *ये दुनिया भीड़ का मेला, पर अंदर से इंसान अकेला॥* कितनी बड़ी सच्चाई कितने सरल शब्दों में कह दी - > हँसता चेहरा, रोती रूह, > गलियों-गलियों शोर मचा है, देह की भूख लगी है, > भीतर हर दिल टूटा पड़ा है। > संबंधों के धागे कच्चे, मतलब के ही मीठे, > फिर छोड़ें जैसे पत्ते सूखे। > भीड़-भरे इस बाजार में, दिल की चीख फिर भी तरसती, > मन मंदिर में पूजा सन्नाटा, साँस-साँस लगे इक झमेला। और अंत में सबसे सुंदर उपाय भी बता दिया - > भीड़ नहीं, तेरा बंधु, सच्चा साथी है परमेश्वर, > जब सब रिश्ते टूट जाएं, नाम प्रभु का बनता बेड़ा। > बाकी सब है रेत का रेला॥ आजकल हर कोई भीड़ में है पर अकेला है, ये भजन उसी अकेलेपन को गले लगाकर ईश्वर से जोड़ देता है।
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