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*अमृत कथा* भगवान का ध्यान करो। वही हमें इस संकट से बचाएंगे।” राजा ने उनका आदेश मानकर भक्तिभाव से भगवान का ध्यान किया। उसी समय विशाल समुद्र में भगवान मत्स्यरूप में प्रकट हुए। उनका शरीर सोने के समान चमक रहा था और लंबाई थी चार लाख कोस। उनके शरीर पर एक विशाल सींग भी था। वासुकि नाग की मदद से नाव को भगवान के सींग में बाँध दिया गया। तब राजा सत्यव्रत का हृदय आनंद से भर गया और उन्होंने श्रद्धा से भगवान की स्तुति की। राजा सत्यव्रत ने भगवान से प्रार्थना की कि जीव अनादि अज्ञान से ढका होने के कारण संसार में दुख भोगता है। केवल भगवान की कृपा से ही वह सच्चे ज्ञान को प्राप्त कर सकता है और बंधन से मुक्त हो सकता है। उन्होंने कहा कि आप ही सच्चे गुरु हैं, जो जीव के अज्ञान को दूर कर उसे आत्मस्वरूप में स्थित करते हैं। जैसे आग से सोना शुद्ध होता है, वैसे ही आपकी सेवा से जीव शुद्ध होता है। संसार के सारे देवता और गुरु भी आपकी कृपा के सामने तुच्छ हैं। अज्ञानी लोग अज्ञानी को ही गुरु बना लेते हैं, जिससे और अंधकार बढ़ता है। लेकिन आप आत्मज्ञान देने वाले दिव्य गुरु हैं। आप ही सच्चे सुहृद, ईश्वर और आत्मा हैं। कृपा करके अपने ज्ञान से मेरे हृदय की अज्ञान-गांठ काट दीजिए। जब राजा सत्यव्रतने इस प्रकार प्रार्थना की; तब मत्स्यरूपधारी पुरुषोत्तमभगवान्ने प्रलयके समुद्रमें विहार करते हुए उन्हें आत्मतत्त्वका उपदेश किया। भगवान्ने राजर्षि सत्यव्रतको अपने स्वरूपके सम्पूर्ण रहस्यका वर्णन करते हुए ज्ञान, भक्ति और कर्मयोगसे परिपूर्ण दिव्य पुराणका उपदेश किया, जिसको ‘मत्स्यपुराण’ कहते हैं। सत्यव्रतने ऋषियोंके साथ नावमें बैठे हुए ही सन्देहरहित होकर भगवान्के द्वारा उपदिष्ट – सनातन ब्रह्मस्वरूप आत्मतत्त्वका श्रवण किया। सत्यव्रतने ऋषियोंके साथ नावमें बैठे हुए ही सन्देहरहित होकर भगवान्के द्वारा उपदिष्ट – सनातन ब्रह्मस्वरूप आत्मतत्त्वका श्रवण किया। इसके बाद जब पिछले प्रलयका अन्त हो गया और ब्रह्माजीकी नींद टूटी, तब भगवान्ने हयग्रीव असुरको मारकर उससे वेद छीन लिये और ब्रह्माजीको दे दिये। भगवान्की कृपासे राजा सत्यव्रत ज्ञान और विज्ञानसे संयुक्त होकर इस कल्पमें वैवस्वत मनु हुए। अन्त में श्री शुकदेवजी कहते हैं कि प्रलयकालीन समुद्र में जब ब्रह्माजी सो गये थे, उनकी सृष्टिशक्ति लुप्त हो चुकी थी, उस समय उनके मुखसे निकली हुई श्रुतियोंको चुराकर हयग्रीव दैत्य पातालमें ले गया था। भगवान्ने उसे मारकर वे श्रुतियाँ ब्रह्माजीको लौटा दी एवं सत्यव्रत तथा सप्तर्षियोंको ब्रह्मतत्त्वका उपदेश किया। उन समस्त जगत्के परम कारण लीलामत्स्य भगवान्को मैं नमस्कार करता हूँ। 🙏🏻 जय सिया राम जी 🙏 शुभप्रभात आपका दिन मंगलमय हो

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