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जय श्री कृष्णा जी 🙏 शुभ दोपहर जी 🙏 क्रोध और विनाश के संबंध में श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने काम, क्रोध और लोभ को नरक का द्वार यानी आत्मा का पतन करने वाले तीन मुख्य शत्रु बताया है। गीता के दूसरे अध्याय (श्लोक 62-63) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: > **ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।** > **सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥** > **क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।** > **स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥** > अर्थात, विषयों का चिंतन करने से मनुष्य की उनमें आसक्ति पैदा होती है, आसक्ति से कामना (इच्छा) पैदा होती है, और कामना में बाधा आने से **क्रोध** उत्पन्न होता है। क्रोध से मूढ़ता (अविवेक) उत्पन्न होती है, मूढ़ता से स्मृति भ्रमित हो जाती है, स्मृति भ्रमित होने से बुद्धि का नाश हो जाता है, और बुद्धि का नाश होने से मनुष्य का पूरी तरह पतन हो जाता है। इसलिए, बाहरी परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों, यदि मनुष्य अपने भीतर के क्रोध पर विजय पा ले, तो वह बड़ी से बड़ी आपदा से भी सुरक्षित निकल सकता है।

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