
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
6 hours ago
*🌺 हनुमान के कारण रावण श्राप से बचा, लेकिन उसी श्राप के जल से अभिशप्त यक्षिणी को मिली मुक्ति 🌺* *कल्पवृक्ष को मुक्त कराकर हनुमान के लौटने के बाद जब महर्षि दुर्वासा वहाँ पहुँचे, तब हनुमान ने उन्हें बताया कि ऋषिवर, कल्पवृक्ष चोरी हो गया था।* *महर्षि दुर्वासा अत्यंत क्रोधित हो उठे। उन्होंने कहा, “मेरे कार्य में किसने हस्तक्षेप किया? किसका इतना दुस्साहस है?”* *वे त्रिकालदर्शी थे। अपनी दिव्य दृष्टि से उन्होंने भूत, वर्तमान और भविष्य को देखा और तुरंत जान गए कि इस पूरे षड्यंत्र के पीछे रावण और बाली का ही हाथ था।* *क्रोध में महर्षि दुर्वासा ने रावण और बाली को श्राप देने का निश्चय किया। उन्होंने अपने तपोबल से जल को अभिमंत्रित किया।* *तभी हनुमान ने महर्षि दुर्वासा से रावण और बाली को क्षमा करने की प्रार्थना की, लेकिन ऋषि नहीं माने। वे श्राप देने ही वाले थे कि तभी रावण की पत्नी देवी मंदोदरी वहाँ पहुँच गईं।* *मंदोदरी ने महर्षि के सामने हाथ जोड़कर कहा, “ऋषिवर, इस बार क्षमा कर दीजिए। यदि आप रावण को श्राप देंगे, तो मेरा सुहाग उजड़ जाएगा और मैं विधवा हो जाऊँगी।”* *महर्षि ने उनकी बात नहीं मानी और कहा, “उसके दुष्कर्मों की यही सजा है।”* *वे फिर श्राप देने के लिए तत्पर हुए।* *तभी हनुमान दौड़कर उनके चरणों में गिर पड़े और बोले, “ऋषिवर, इस बार उन्हें क्षमा कर दीजिए। उन्हें अपने कर्म सुधारने का एक अवसर दीजिए।”* *हनुमान की विनम्र प्रार्थना देखकर महर्षि दुर्वासा ने रावण और बाली को एक अंतिम अवसर दे दिया।* *महर्षि ने मंदोदरी से कहा, “आज हनुमान के कारण रावण श्राप से बच गया है। भविष्य में तुम्हें इसका प्रतिफल हनुमान को देना होगा।”* *मंदोदरी ने हाथ जोड़कर कहा, “ऋषिवर, मैं आपको वचन देती हूँ कि भविष्य में हनुमान के इस उपकार का प्रतिफल अवश्य दूँगी।”* *फिर महर्षि ने कहा, “लेकिन एक बात याद रखना—यदि इसके बाद रावण कभी हनुमान के मार्ग में आया, तो उसे मेरी दृष्टि से कोई नहीं बचा सकेगा। तब मैं स्वयं उसे उसके कर्मों का परिणाम समझाऊँगा।”* *मंदोदरी ने हनुमान को धन्यवाद दिया और महर्षि दुर्वासा को भी प्रणाम करके वहाँ से चली गईं।* *अब भी महर्षि के हाथ में वह अभिमंत्रित जल था। हनुमान ने देखा कि ऋषि अभी तक उस जल को अपने हाथ में धारण किए हुए हैं।* *हनुमान ने पूछा, “ऋषिवर, अब इस जल का क्या करेंगे?”* *महर्षि ने कहा, “यह जल श्राप के लिए अभिमंत्रित किया गया है। इसे जहाँ भी डाला जाएगा, वहाँ विनाश हो जाएगा।”* *हनुमान ने विनम्रता से कहा, “यदि आप उचित समझें तो यह कार्य मुझे सौंप दीजिए।”* *महर्षि ने एक छोटे पात्र में वह जल हनुमान को देते हुए कहा, “ठीक है, इसे ले जाओ।”* *हनुमान उस अभिमंत्रित जल को लेकर आकाश मार्ग से उड़ चले। लेकिन उनके मन में एक ही बात थी—इसे कहाँ डाला जाए।* *तभी अचानक उनके पास से उड़ता हुआ एक पक्षी गुजरते-गुजरते अचानक अदृश्य हो गया। हनुमान चौंककर आकाश में रुक गए।* *उसी क्षण किसी ने उनके पैरों को जकड़ लिया।* *नीचे देखा तो विशाल मेंढक के रूप में एक राक्षसी अपनी लंबी और भयानक जीभ से उनके पैरों को बाँधकर खींच रही थी। उसका आकार बहुत बड़ा और भयावह था।* *राक्षसी गरजकर बोली, “मैं बरसाहुरी हूँ! इस मार्ग से जो भी गुजरता है, वह मेरे हाथों से बच नहीं सकता। मेरे उदर में जाने से तुम्हें भी कोई नहीं बचा सकता। आज तुम्हें भी मैं अपना आहार बना लूँगी!”* *वह अपनी विशाल जीभ से हनुमान को खींचते हुए अपने मुख के पास ले जाने लगी।* *हनुमान चुपचाप उसकी बात सुनते रहे। फिर कहा, “मुझे खाने से पहले यह जल तो पी लो।”* *इतना कहकर हनुमान ने उसी अभिमंत्रित जल को राक्षसी के मुख में डाल दिया।* *अगले ही क्षण एक भयंकर विस्फोट हुआ और राक्षसी का विशाल शरीर फटकर धरती पर गिर पड़ा। हनुमान भी नीचे उतरकर स्थिर खड़े हो गए।* *तभी उस स्थान पर एक दिव्य नारी प्रकट हुई।* *उसने हनुमान के सामने हाथ जोड़कर कहा, “धन्यवाद, हनुमान! मैं एक अभागी यक्षिणी हूँ। एक ऋषि के श्राप के कारण मुझे इस भयंकर राक्षसी का रूप धारण करना पड़ा था। आज तुम्हारे कारण मुझे उस श्राप से मुक्ति मिली है।”* *वह हनुमान को प्रणाम करके बोली, “तुम्हें कोटि-कोटि प्रणाम।”* *इतना कहकर वह दिव्य यक्षिणी वहाँ से अदृश्य हो गई।यह कहानी ‘जय हनुमान’ पेज द्वारा लिखी गई है।* *हनुमान कुछ क्षण उस स्थान को देखते रहे। जिस अभिमंत्रित जल से रावण और बाली को श्राप दिया जाना था, उसी जल ने अनजाने में एक अभिशप्त यक्षिणी को भी मुक्ति दे दीl*

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