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SHREE SHARMA

117 days ago

यह कहानी भक्ति, गुरु-शिष्य परंपरा और प्रभु की कृपा का एक बहुत ही सुंदर और मार्मिक उदाहरण है। ऋषि सुतीक्षण, महर्षि अगस्त्य के परम प्रिय शिष्यों में से एक थे। जब भगवान श्री राम वनवास के दौरान दंडकारण्य में थे, तब वे विभिन्न ऋषियों के आश्रमों में जा रहे थे। सुतीक्षण जी को जब पता चला कि प्रभु उनके आश्रम की ओर आ रहे हैं, तो वे अपनी सुध-बुध खो बैठे। वे इतने भावविभोर थे कि उन्हें यह भी ध्यान नहीं रहा कि वे कहाँ जा रहे हैं। भगवान राम ने जब सुतीक्षण की निष्कपट भक्ति देखी, तो उन्होंने उनके हृदय में अपनी चतुर्भुज रूप की झांकी दिखाई। सुतीक्षण जी भगवान के चरणों में गिर पड़े। इसके बाद ही वह प्रसंग आता है जहाँ भगवान राम उन्हें महर्षि अगस्त्य के पास चलने को कहते हैं। सुतीक्षण जी ने श्री राम को अपनी उस पुरानी गलती के बारे में बताया जिसके कारण उनके गुरु अगस्त्य मुनि उनसे रुष्ट हो गए थे। ऋषि अगस्त्य जब तीर्थ यात्रा पर जा रहे थे, तब उन्होंने अपनी सबसे प्रिय 'शालिग्राम शिला' (भगवान विष्णु का स्वरूप) सुतीक्षण को सौंपी थी। सुतीक्षण रोज उस शिला को स्नान कराते और चंदन लगाते। एक दिन जामुन खाने की इच्छा में उन्होंने उसी पवित्र शिला को पत्थर समझकर पेड़ पर दे मारा। शिला नदी की गहराई में खो गई। एक बालक की तरह सरल सुतीक्षण ने सोचा कि शालिग्राम और जामुन का आकार-प्रकार एक जैसा ही है। उन्होंने वेदी पर एक जामुन रख दिया। जब गुरुदेव लौटे और उन्होंने जल चढ़ाया, तो जामुन गल गया। गुरुदेव ने पूछा— "यह शिला को क्या हुआ?" सुतीक्षण ने डरते हुए कहा— "महाराज, इतने दिनों तक जल में रहने के कारण पत्थर नरम हो गया और गल गया।" अगस्त्य मुनि ने जब अपनी दिव्य दृष्टि से देखा, तो वे क्रोधित हुए। उन्होंने कहा— "मूर्ख! तुमने साक्षात नारायण का अपमान किया है। जब तक स्वयं नारायण को साक्षात यहाँ लेकर नहीं आते, मुझे अपना मुख मत दिखाना।" सालों की तपस्या के बाद जब राम स्वयं सुतीक्षण के सामने खड़े थे, तो उन्हें लगा कि उनकी तपस्या सफल हुई। उन्होंने भगवान राम से कहा: "प्रभु, मेरे गुरु ने मुझसे पत्थर की शिला मांगी थी, लेकिन मैं उनके लिए साक्षात 'कौशल्या-नंदन' को लेकर जा रहा हूँ। जिस शालिग्राम की वे पूजा करते थे, आज उसका साक्षात स्वरूप मेरे साथ है।" लोकोक्ति जो ग्रामीण अंचलों में सुतीक्षण जी की सरलता के लिए बहुत प्रसिद्ध है: "पुनि पुनि चंदन पुनि पुनि पानी। देउता सरिगे हम का जानीं!" अर्थ: "बार-बार चंदन लगाया और बार-बार पानी (अभिषेक) डाला। अब देवता गल गए या बह गए, तो इसमें मेरी क्या गलती, मैं क्या जानूँ!" यह पंक्ति सुतीक्षण जी के उस निश्छल और भोले भाव को दर्शाती है, जहाँ एक भक्त ईश्वर को कर्मकांडों से ऊपर उठकर अपने सहज प्रेम से देखता है। कथा का आध्यात्मिक संदेश 1. गुरु का दंड भी शिष्य के कल्याण के लिए होता है। अगर अगस्त्य मुनि ने सुतीक्षण को निकाला न होता, तो शायद वे राम को लाने का इतना प्रबल संकल्प न करते। 2. सुतीक्षण ने अपनी गलती छिपाई नहीं, बल्कि उसे स्वीकार किया और उसे सुधारने के लिए साक्षात भगवान को ही खोज लिया। 3. भगवान केवल भाव के भूखे हैं। सुतीक्षण के भोलेपन में जो प्रेम था, उसने ब्रह्मांड के स्वामी को एक शिष्य का साथ देने पर मजबूर कर दिया। जय श्री राम!

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