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भगवान श्रीकृष्ण को भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में उनकी लीलाओं और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार विभिन्न नामों और रूपों में पूजा जाता है: * **मथुरा और गोकुल (उत्तर प्रदेश) — कान्हा, बाल गोपाल और माखनचोर** जन्मभूमि मथुरा और बाल्यकाल की स्थली गोकुल-वृंदावन में प्रभु को मुख्य रूप से नटखट बालक के रूप में पूजा जाता है। यहाँ वे लड्डू गोपाल, बाल कृष्ण और कान्हा कहलाते हैं। * **वृंदावन (उत्तर प्रदेश) — बांके बिहारी और राधावल्लभ** वृंदावन में त्रिभंग मुद्रा (तीन जगह से मुड़ी हुई मनमोहक भंगिमा) में स्थित विग्रह को 'बांके बिहारी' के नाम से पूजा जाता है। इसके अलावा प्रेम और भक्ति के प्रतीक रूप में यहाँ उन्हें 'राधावल्लभ' भी कहा जाता है। * **द्वारका (गुजरात) — द्वारकाधीश** गुजरात के पश्चिमी तट पर बसी अपनी भव्य राजधानी में श्रीकृष्ण को एक राजा, न्यायप्रिय शासक और मर्यादा पालक के रूप में पूजा जाता है। यहाँ उनका स्वरूप राजाधिराज 'द्वारकाधीश' का है। * **डाकोर (गुजरात) — रणछोड़राय** मगध नरेश जरासंध के साथ युद्ध के दौरान प्रजा और सेना को अनावश्यक रक्तपात से बचाने के लिए जब वे रणभूमि छोड़कर भागे, तब उन्हें 'रणछोड़' कहा गया। गुजरात के डाकोर में भक्त उन्हें इसी नाम से श्रद्धापूर्वक पूजते हैं। * **पुरी (ओडिशा) — जगन्नाथ** ओडिशा के जगन्नाथ पुरी धाम में श्रीकृष्ण अपने बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ विराजमान हैं। यहाँ उन्हें 'जगन्नाथ' यानी "जगत के नाथ (स्वामी)" के रूप में पूजा जाता है। * **पंढरपुर (महाराष्ट्र) — विट्ठल / विठोबा** महाराष्ट्र के पंढरपुर में चंद्रभागा नदी के तट पर कान्हा 'विट्ठल' या 'विठोबा' के नाम से पूजे जाते हैं। भक्त पुंडलिक की मातृ-पितृ भक्ति से प्रसन्न होकर वे यहाँ ईंट पर कमर पर हाथ रखकर खड़े हैं। * **नाथद्वारा (राजस्थान) — श्रीनाथजी** राजस्थान के राजसमंद में श्रीकृष्ण को सात वर्ष के बालक रूप में पूजा जाता है, जिन्होंने अपनी कनिष्ठिका (छोटी) उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा रखा है। पुष्टिमार्ग संप्रदाय में यह प्रमुख तीर्थ है। * **गुरुवायूर (केरल) — गुरुवायूरप्पन** दक्षिण भारत के केरल में स्थित प्रसिद्ध गुरुवायूर मंदिर में श्रीकृष्ण को 'गुरुवायूरप्पन' कहा जाता है। मान्यता है कि इस विग्रह की स्थापना देवगुरु बृहस्पति और वायुदेव ने की थी, इसलिए यह नाम पड़ा। * **उडुपी (कर्नाटक) — उडुपी कृष्ण** कर्नाटक के उडुपी में बाल कृष्ण का अत्यंत सुंदर विग्रह है, जिसे भक्त कनकदास की अटूट भक्ति के प्रतीक 'कनकन किंडी' (एक विशेष नौ छेदों वाली खिड़की) के माध्यम से देखा और पूजा जाता है।

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