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*📜 25 मार्च 📜* *🌹 गणेश शंकर विद्यार्थी // बलिदान दिवस 🌹* जन्म : 26 अक्टूबर 1890 *गणेश शंकर विद्यार्थी का बलिदान दिवस:* (25 मार्च) *शहादत:* 25 मार्च 1931 को कानपुर में भीषण सांप्रदायिक दंगों के दौरान। गणेश शंकर विद्यार्थी (26 अक्टूबर 1890 - 25 मार्च 1931) एक महान स्वतंत्रता सेनानी, निर्भीक पत्रकार और साम्प्रदायिक सद्भाव के प्रतीक थे। 25 मार्च 1931 को कानपुर दंगों में हिंदू-मुस्लिम दंगे के दौरान निस्सहायों की जान बचाते हुए उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दे दी। उनका बलिदान राष्ट्र की एकता के लिए सर्वोच्च उदाहरण है। *बलिदान की पृष्ठभूमि:* भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी (23 मार्च) के बाद फैले दंगों में वे शांतिकर्मियों को बचाने मैदान में उतरे। *परिणाम:* सांप्रदायिक सद्भाव की रक्षा करते हुए, क्रोधित भीड़ ने उन पर हमला कर दिया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। उनका शव कई दिनों बाद मिला था। *योगदान:* वे 'प्रताप' (Pratap) समाचार पत्र के संपादक थे, जो अंग्रेजी शासन और सामाजिक अन्याय के खिलाफ एक सशक्त आवाज था। *पहचान:* महात्मा गांधी ने उन्हें 'देश का गौरव' कहा था, जिन्होंने सांप्रदायिकता के खिलाफ अपनी जान न्यौछावर कर दी। *विद्यार्थी जी का जीवन हमें याद दिलाता है कि सच्चा राष्ट्रसेवक धर्म के नाम पर हिंसा के सामने कभी नहीं झुकता।* सन् 1911 ई. में विद्यार्थी जी सरस्वती में पं॰ महावीर प्रसाद द्विवेदी के सहायक के रूप में नियुक्त हुए। कुछ समय बाद "सरस्वती" छोड़कर "अभ्युदय" में सहायक संपादक हुए। यहाँ सितंबर, 1913 तक रहे। दो ही महीने बाद 9 नवम्बर 1913 को कानपुर से स्वयं अपना हिंदी साप्ताहिक प्रताप के नाम से निकाला। इसी समय से 'विद्यार्थी' जी का राजनीतिक, सामाजिक और प्रौढ़ साहित्यिक जीवन प्रारंभ हुआ। पहले इन्होंने लोकमान्य तिलक को अपना राजनीतिक गुरु माना, किंतु राजनीति में गांधी जी के अवतरण के बाद आप उनके अनन्य भक्त हो गए। श्रीमती एनीं बेसेंट के 'होमरूल' आंदोलन में विद्यार्थी जी ने बहुत लगन से काम किया और कानपुर के मजदूर वर्ग के एक छात्र नेता हो गए। कांग्रेस के विभिन्न आंदोलनों में भाग लेने तथा अधिकारियों के अत्याचारों के विरुद्ध निर्भीक होकर "प्रताप" में लेख लिखने के संबंध में ये 5 बार जेल गए और "प्रताप" से कई बार जमानत माँगी गई। कुछ ही वर्षों में वे उत्तर प्रदेश (तब संयुक्तप्रांत) के चोटी के कांग्रेस नेता हो गए। 1925 ई. में कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन की स्वागत-समिति के प्रधानमंत्री हुए तथा 1930 ई. में प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष हुए। इसी नाते सन् 1930 ई. के सत्याग्रह आंदोलन के अपने प्रदेश के सर्वप्रथम "डिक्टेटर" नियुक्त हुए। साप्ताहिक "प्रताप" के प्रकाशन के 7 वर्ष बाद 1920 ई. में विद्यार्थी जी ने उसे दैनिक कर दिया और "प्रभा" नाम की एक साहित्यिक तथा राजनीतिक मासिक पत्रिका भी अपने प्रेस से निकाली। "प्रताप" किसानों और मजदूरों का हिमायती पत्र रहा। उसमें देशी राज्यों की प्रजा के कष्टों पर विशेष सतर्क रहते थे। "चिट्ठी पत्री" स्तम्भ "प्रताप" की निजी विशेषता थी। विद्यार्थी जो स्वयं तो बड़े पत्रकार थे ही, उन्होंने कितने ही नवयुवकों को पत्रकार, लेखक और कवि बनने की प्रेरणा तथा ट्रेनिंग दी। ये "प्रताप" में सुरुचि और भाषा की सरलता पर विशेष ध्यान देते थे। फलत: सरल, मुहावरेदार और लचीलापन लिए हुए चुस्त हिंद की एक नई शैली का इन्होंने प्रवर्तन किया। कई उपनामों से भी ये प्रताप तथा अन्य पत्रों में लेख लिखा करते थे। अपने जेल जीवन में इन्होंने विक्टर ह्यूगो के दो उपन्यासों, "ला मिजरेबिल्स" तथा "नाइंटी थ्री" का अनुवाद किया। हिन्दी साहित्य सम्मलेन के 19वें (गोरखपुर) अधिवेशन के ये सभापति चुने गए। विद्यार्थी जी बड़े सुधारवादी किन्तु साथ ही धर्म-परायण और ईश्वरभक्त थे। वक्ता भी बहुत प्रभावपूर्ण और उच्च कोटि के थे। यह स्वभाव के अत्यन्त सरल, किन्तु क्रोधी और हठी भी थे। मजहब के नाम पर लड़ने वालों के खिलाफ ज़िन्दगी भर गणेश शंकर लड़ते रहे और वहीं मारकाट उनके आस-पास हो रही थी ऐसे मौके पर गणेश शंकर से न रहा गया और निकल पड़े रोकने कई जगह तो कामयाब रहे पर कुछ ही देर में ही वो दंगाइयों की एक टुकड़ी में फंस गए और कानपुर के सांप्रदायिक दंगे में मुस्लिमों द्वारा 25 मार्च 1931 ई. को इनकी हत्या कर दी गई। 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

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