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मेघालय में जो प्राकृतिक पुल बनते हैं, उन्हें 'लिविंग रूट ब्रिज' (Living Root Bridges) या स्थानीय खासी भाषा में 'जिंग कीेंग जेरी' (Jing Kieng Jri) कहा जाता है। इन पुलों की सबसे खास बात यह है कि इन्हें बनाया नहीं जाता, बल्कि उगाया जाता है। यहाँ इनके बारे में कुछ रोचक जानकारियां दी गई हैं: * किसने और कैसे: इन्हें मेघालय की खासी (Khasi) और जयंतिया (Jaintia) जनजातियों के लोगों द्वारा तैयार किया जाता है। वे रबड़ के पेड़ (Ficus elastica) की मजबूत जड़ों को बांस के पाइपों के सहारे नदी के एक छोर से दूसरे छोर तक ले जाते हैं। * समय के साथ मजबूती: जैसे-जैसे पेड़ बड़ा होता है, ये जड़ें और भी मजबूत होती जाती हैं। एक जीवित जड़ पुल को पूरी तरह तैयार होने में लगभग 10 से 15 साल का समय लगता है। * टिकाऊपन: कंक्रीट के पुलों के विपरीत, ये पुल जितने पुराने होते हैं, उतने ही मजबूत होते जाते हैं। इनमें से कुछ पुल तो 500 साल से भी ज्यादा पुराने हैं। * डबल डेकर पुल: चेरापूंजी (सोहरा) के पास स्थित 'नोंग रियात' गाँव का 'उमशियांग डबल डेकर रूट ब्रिज' सबसे प्रसिद्ध है, जहाँ एक के ऊपर एक दो प्राकृतिक पुल बने हुए हैं। ये पुल इस बात का बेहतरीन उदाहरण हैं कि कैसे इंसान और प्रकृति बिना एक-दूसरे को नुकसान पहुँचाए मिलकर रह सकते हैं।

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