
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
81 days ago
भक्ति मार्ग में सिद्धियां (चमत्कार करने की शक्ति) वास्तव में बाधक होती हैं, एक बार संत ज्ञानदेव जी और संत नामदेव जी दोनों महापुरुष ब्रज मंडल के दर्शन करने के लिए आए थे। यात्रा के दौरान दोनों संतों को बहुत तेज प्यास लगी। सामने एक कुआं था, लेकिन उसका जल काफी गहरा था और उसे निकालने के लिए पास में कोई पात्र (बर्तन) या रस्सी नहीं थी। ज्ञानदेव जी महाराज योग मार्ग के सिद्ध पुरुष थे। उन्होंने कहा कि पानी के लिए इंतजार करने की जरूरत नहीं है। उन्होंने अपनी योग विद्या का प्रयोग किया और अपना शरीर 'सूक्ष्म' (अत्यंत छोटा) बना लिया। वे सूक्ष्म रूप धारण करके कुएं के भीतर उतर गए, तृप्त होकर पानी पिया और वापस बाहर आ गए। उन्होंने नामदेव जी से भी कहा कि वे इसी तरह अपनी प्यास बुझा सकते हैं। ज्ञानदेव जी की बात सुनकर नामदेव जी ने बड़ी सहजता से उत्तर दिया। उन्होंने कहा कि पानी पीने के लिए सूक्ष्म शरीर धारण करके कुएं में उतरने जैसे श्रम की आवश्यकता ही क्या है? नामदेव जी पूर्णतः भगवान के नाम और भक्ति के आश्रित थे। उन्होंने वहीं बैठकर प्रेम और तन्मयता के साथ भगवान का नाम पुकारना शुरू किया— "विट्ठल, विट्ठल, विट्ठल..."। जैसे ही नामदेव जी ने नाम संकीर्तन शुरू किया, एक अद्भुत चमत्कार हुआ। कुएं का जल स्तर अपने आप धीरे-धीरे ऊपर उठने लगा। देखते ही देखते जल कुएं के बिल्कुल ऊपर तक आ गया और बाहर बहने लगा। नामदेव जी ने बड़े आराम से अंजलि (चुल्लू) भर-भर कर जल पिया। जहाँ ज्ञानदेव जी ने अपनी प्यास बुझाने के लिए योग और 'सिद्धि' का सहारा लिया, वहीं नामदेव जी ने 'नाम की महिमा' को सिद्ध किया। सिद्धियां 'अहंकार' ला सकती हैं या वे एक भूल-भुलैया हो सकती हैं, लेकिन भगवान का नाम सीधे परमात्मा को द्रवित कर देता है। नामदेव जी ने दिखाया कि प्रभु के चरणों का आश्रय लेने वाले भक्त के लिए प्रकृति भी अपनी मर्यादा छोड़कर सेवा में उपस्थित हो जाती है। राधे राधे🙏🌹


