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नाथ परंपरा के वृद्ध संत ने नाग का दृष्टांत देकर बात कही थी, उन्होंने कहा- "यदि साधु होना है, तो नाग से सीखो।" नाग अपना बिल स्वयं नहीं बनाता, जैसे साधु अपना स्थायी घर नहीं बनाता। जहाँ ईश्वर स्थान दे, वहीं उसका निवास। नाग संग्रह नहीं करता, वैसे ही साधु आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संचय नहीं करता। जितना आज के लिए पर्याप्त हो, उतना ही उसका धन। नाग शिकार के पीछे नहीं भागता, जैसे साधु भिक्षा, धन, यश या शिष्यों के पीछे नहीं दौड़ता। जो सहज प्राप्त हो, वही प्रसाद। नाग समय आने पर पुरानी केंचुल छोड़ देता है, साधु भी अहंकार, पहचान, प्रतिष्ठा और आसक्ति को छोड़ते हुए निरंतर नया जन्म लेता है। नाग अधिकतर एकांत में रहता है, वैसे ही साधु भी भीड़ नहीं, आत्मसंग और साधना को प्रिय मानता है। नाग अपने विष का प्रदर्शन नहीं करता, केवल आवश्यकता पड़ने पर ही उसका प्रयोग करता है। साधु भी अपने ज्ञान, तप, सिद्धि या सामर्थ्य का प्रदर्शन नहीं करता; उनका उपयोग केवल धर्म और लोककल्याण के लिए करता है। नाग बिना कारण किसी को नहीं डँसता, साधु भी बिना कारण कठोर नहीं होता, लेकिन धर्म, सत्य और मर्यादा की रक्षा में मौन भी नहीं रहता। और जैसे नाग एक ही बिल से जीवनभर नहीं बँधता, वैसे ही साधु किसी स्थान, व्यक्ति या सुविधा का होकर नहीं रह जाता। उसका स्वभाव ही रमण और गमन है। "रमता जोगी और चलता नाग।।। दोनों की पहचान उनके ठहरने से नहीं, उनकी अनासक्ति से होती है।" साधु का वैभव उसके आश्रम, वस्त्र या अनुयायियों में नहीं, बल्कि असंगता, अपरिग्रह और निरंतर गतिमान जीवन में है।

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