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ये द्वारका की बहुत प्रसिद्ध और हृदय विदारक कथा है - *क्यों रुक्मिणी जी द्वारका में श्रीकृष्ण के साथ नहीं रहतीं? और क्यों आज भी द्वारका में मीठे पानी की कमी है?* इसका विस्तार से वर्णन पद्म पुराण में मिलता है। 1. दुर्वासा ऋषि का आगमन एक बार क्रोध के लिए प्रसिद्ध महर्षि दुर्वासा द्वारका पधारे। भगवान श्रीकृष्ण और रानी रुक्मिणी ने उनका बड़े प्रेम से स्वागत किया, महल में ठहराया। भोजन से पहले दुर्वासा ने एक विचित्र शर्त रखी - "मैं रथ पर भ्रमण करूंगा, पर रथ में घोड़े नहीं जुते होंगे। तुम पति-पत्नी ही रथ खींचोगे, तभी मैं तुम्हारा अन्न ग्रहण करूंगा।" भगवान तो लीलाधारी हैं, उन्होंने तुरंत आज्ञा मान ली। 2. रेगिस्तान में परीक्षा एक तरफ सृष्टि के पालनहार नारायण, दूसरी तरफ विदर्भ की राजकुमारी, कोमलांगी रुक्मिणी। दोनों के कंधे पर रथ का जुआ। ऊपर आकाश से सूर्य आग बरसा रहा है, नीचे रेत अंगारों जैसी तप रही है। रथ पर दुर्वासा मौन बैठे हैं, जैसे हर कदम पर परीक्षा ले रहे हों। थोड़ी देर में ही रुक्मिणी के कोमल पैर जलने लगे, होंठ सूख गए, गला सूख गया। फिर भी उन्होंने कुछ नहीं कहा, क्योंकि दुर्वासा का श्राप पूरी द्वारका को तबाह कर सकता था। जब प्यास असहनीय हो गई, तो उन्होंने आंखों से ही अपने स्वामी से प्रार्थना की। 3. एक घूंट जल और अनर्थ करुणामय श्रीकृष्ण अपनी प्रिया की दशा देख विचलित हो गए। उन्होंने बिना देर किए अपने पैर के अंगूठे से धरती पर आघात किया। वहां से एक शीतल गंगा-धारा फूट पड़ी। प्यास से व्याकुल रुक्मिणी ने तुरंत अंजलि भर कर वो जल पी लिया। प्यास तो बुझ गई, पर एक बड़ी भूल हो गई। उस युग में अतिथि धर्म सबसे बड़ा धर्म था। रथ पर बैठे अतिथि से बिना पूछे जल पीना अपराध माना जाता था। दुर्वासा ने ये देखते ही रथ रोक दिया, उनका चेहरा क्रोध से लाल हो गया। 4. दुर्वासा का श्राप क्रोध में दुर्वासा ने तीन श्राप दिए - *1. रुक्मिणी को:* "तुमने अतिथि का अपमान कर जल पिया है, इसलिए तुम मेरे श्राप से 12 वर्षों तक अपने पति से अलग रहोगी। जिस द्वारका में कृष्ण रहेंगे, तुम वहां उनके साथ नहीं रह पाओगी।" *2. श्रीकृष्ण को:* "तुमने पत्नी का पक्ष लेकर अतिथि धर्म तोड़ा, इसलिए तुम भी इस विरह की पीड़ा भोगोगे।" *3. द्वारका को:* "जिस भूमि पर तुमने बिना पूछे जल पिया, वह भूमि आज से खारी हो जाएगी। यहाँ मीठे पानी की सदा कमी रहेगी।" यह सुन कर रुक्मिणी रो पड़ीं, श्रीकृष्ण ने भी हाथ जोड़ कर क्षमा मांगी, तब दुर्वासा का क्रोध कुछ शांत हुआ और उन्होंने कहा - 12 वर्ष बाद तुम फिर से मिल जाओगे। इस कथा का अर्थ क्या है? कहते हैं तभी से रुक्मिणी जी द्वारका में मुख्य मंदिर से थोड़ी दूर, अलग मंदिर में रहती हैं। और आज भी द्वारका जो समुद्र के किनारे बसी है, वहां मीठा पानी बहुत मुश्किल से मिलता है। ये कथा हमें सिखाती है कि भगवान भी जब मनुष्य रूप में लीला करते हैं, तो वे भी धर्म, अतिथि-सत्कार और मर्यादा का पालन करते हैं। और प्यास चाहे कितनी भी बड़ी हो, मर्यादा उससे बड़ी होती है।

Comments (2)

सविता

सविता

Aug 30, 2026

bahut sunder parsang 🙏🌹

सविता

सविता

Aug 30, 2026

RADHE RADHE 🙏🌹