MyMandirInstall

क्या आप जानते हैं? गंगा स्वयं पृथ्वी पर आने से मना कर रही थीं… फिर ऐसा क्या हुआ कि उन्हें महादेव के साथ 'गोदावरी' बनकर अवतरित होना पड़ा? जानिए 'दक्षिण गंगा' की अद्भुत कथा। "हर नदी केवल जल की धारा नहीं होती, कुछ नदियाँ ईश्वर की करुणा बनकर धरती पर उतरती हैं। गोदावरी ऐसी ही एक दिव्य धारा है, जिसका जन्म किसी पर्वत से नहीं, बल्कि एक महर्षि के पश्चाताप, महादेव की कृपा और गंगा की करुणा से हुआ था।" प्राचीन काल की बात है। दक्षिण भारत में एक भयानक विपत्ति आई। लगातार 100 वर्षों तक वर्षा नहीं हुई। नदियाँ सूख गईं, खेत बंजर हो गए, पशु-पक्षी तड़पने लगे और मनुष्य भूख-प्यास से व्याकुल हो उठे। चारों ओर केवल निराशा ही निराशा थी। ऐसे कठिन समय में भी एक आश्रम ऐसा था जहाँ किसी भूखे को कभी निराश नहीं लौटना पड़ता था। वह था महर्षि गौतम का आश्रम। महर्षि गौतम ने अपनी कठोर तपस्या और दिव्य योगबल से एक ऐसा चमत्कारी खेत उत्पन्न किया था, जहाँ अन्न कभी समाप्त नहीं होता था। दूर-दूर से ऋषि, मुनि, साधु, यात्री और भूखे लोग वहाँ आते और प्रेमपूर्वक भोजन पाकर तृप्त हो जाते। धीरे-धीरे महर्षि गौतम की कीर्ति चारों दिशाओं में फैलने लगी। लोग उन्हें करुणा, सेवा और धर्म का जीवंत स्वरूप मानने लगे। लेकिन संसार में जहाँ सम्मान होता है, वहाँ ईर्ष्या भी जन्म लेती है। कुछ ऋषियों को गौतम ऋषि की बढ़ती प्रतिष्ठा सहन नहीं हुई। उनके मन में द्वेष की अग्नि भड़क उठी। उन्होंने सोचा—"यदि गौतम की महानता ऐसे ही बढ़ती रही, तो लोग हमें भूल जाएंगे।" ईर्ष्या ने उनके विवेक को ढक लिया। उन्होंने अपनी मायावी शक्तियों से एक अत्यंत सुंदर दिव्य गाय की रचना की और उसे गौतम ऋषि के खेत में भेज दिया। गाय खेत में प्रवेश करके फसल नष्ट करने लगी। महर्षि गौतम उस समय पूजा से लौट रहे थे। उन्होंने देखा कि उनकी मेहनत से तैयार की गई फसल नष्ट हो रही है। वे किसी प्रकार की हिंसा नहीं करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने केवल हाथ में पड़ा एक सूखा तिनका उठाया और अत्यंत हल्के से गाय को खेत से बाहर करने का प्रयास किया। लेकिन जैसे ही वह तिनका गाय को स्पर्श करता है... वह मायावी गाय अचानक भूमि पर गिरकर प्राणहीन हो जाती है। क्षणभर में वही षड्यंत्रकारी ऋषि वहाँ पहुँच गए। उन्होंने ऊँचे स्वर में घोषणा कर दी— "गौतम ने गौ-हत्या कर दी है!" पूरे आश्रम में हाहाकार मच गया। महर्षि गौतम स्तब्ध रह गए। वे जानते थे कि उन्होंने किसी प्रकार की हिंसा नहीं की थी, फिर भी गाय उनके स्पर्श से मृत पड़ी थी। उनका हृदय अपराधबोध से भर उठा। ऋषियों ने उन्हें अपवित्र घोषित कर आश्रम छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया। महर्षि गौतम ने किसी से विवाद नहीं किया, किसी पर आरोप नहीं लगाया। उन्होंने केवल इतना कहा— "यदि मुझसे अनजाने में भी कोई पाप हुआ है, तो मैं उसका प्रायश्चित अवश्य करूँगा।" यही एक सच्चे संत की पहचान होती है। इसके बाद वे ब्रह्मगिरि पर्वत पर पहुँचे और भगवान शिव की घोर तपस्या आरंभ कर दी। दिन बीतते गए… महीने बीत गए… वर्ष बीत गए… किन्तु उनकी तपस्या में तनिक भी कमी नहीं आई। अंततः संपूर्ण ब्रह्मांड को आलोकित करते हुए भगवान शिव उनके सामने प्रकट हुए। महादेव ने प्रेमपूर्वक कहा— "वत्स गौतम! मैं तुम्हारी निष्कलुष भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हूँ। वर माँगो।" महर्षि गौतम ने हाथ जोड़कर विनम्र स्वर में कहा... "हे देवाधिदेव! यदि मुझसे अनजाने में भी गौ-हत्या का पाप हुआ है, तो मुझे उससे मुक्त कर दीजिए। और यदि आपकी कृपा हो तो माता गंगा की एक धारा यहाँ प्रवाहित कर दीजिए, ताकि मैं उसमें स्नान करके स्वयं को शुद्ध कर सकूँ और समस्त मानवता भी पवित्र हो सके।" महर्षि की निस्वार्थ प्रार्थना सुनकर भगवान शिव का हृदय करुणा से भर उठा। उन्होंने अपनी जटाओं से माता गंगा को पृथ्वी पर अवतरित होने का आदेश दिया। किन्तु माता गंगा ने विनम्रतापूर्वक कहा— "प्रभो! यदि मुझे यहाँ रहना है, तो मेरी एक शर्त है। जहाँ मैं प्रवाहित होऊँगी, वहाँ आप भी सदैव निवास करेंगे। आपके बिना मेरा अस्तित्व अधूरा है।" भगवान शिव मुस्कुराए। उन्होंने गंगा की शर्त स्वीकार कर ली। उसी क्षण भगवान शिव वहाँ त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हो गए और माता गंगा उस स्थान पर एक नई दिव्य धारा के रूप में प्रकट हुईं। वही पावन धारा आगे चलकर गोदावरी नदी कहलायी। कहा जाता है कि इस नदी का नाम 'गोदावरी' इसलिए

Post media

Comments (0)

No comments yet. Be the first to comment!