
SHREE SHARMA
21 days ago
यह प्रसंग शिव पुराण की शतरुद्र संहिता के अंतिम अध्यायों में आता है। यह संवाद एकादश रुद्रावतार भगवान हनुमान जी और ज्ञानवृद्ध महर्षि अर्जन (कुछ पांडुलिपियों में ऋज्जन या अर्जन मुनि) के बीच गंधमादन पर्वत पर हुआ था। यह प्रसंग शिव-भक्ति और राम-भक्ति के अभिन्न संबंध को बहुत ही सुंदर ढंग से स्पष्ट करता है। 1. गंधमादन पर्वत पर हनुमान जी का निवास श्रीराम कथा के पूर्ण होने और प्रभु श्रीराम के साकेत धाम गमन के पश्चात्, भगवान हनुमान जी (जो रुद्र के 11वें अवतार हैं) को इस धराधाम पर अजर-अमर रहकर धर्म और राम-नाम की रक्षा का दायित्व मिला। हनुमान जी हिमालय के पावन गंधमादन पर्वत पर एक अत्यंत शांत, दिव्य आश्रम बनाकर एकांत में भगवान राम के ध्यान और शिव-तत्व के चिंतन में लीन रहने लगे। उस क्षेत्र का वातावरण हनुमान जी के तपोबल से निरंतर राम-नाम के गुंजन और शिव-मंत्रों की ध्वनियों से सुवासित रहता था। 2. अर्जन मुनि का आगमन और जिज्ञासा ज्ञान और मोक्ष की अभिलाषा रखने वाले महर्षि अर्जन अनेक तीर्थों की यात्रा करते हुए गंधमादन पर्वत पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने भगवान हनुमान जी को एक विशाल वृक्ष के नीचे अचल, तेजस्वी और समाधिस्थ अवस्था में देखा। हनुमान जी के तेज से प्रभावित होकर महर्षि अर्जन ने उनके चरणों में प्रणाम किया। जब हनुमान जी ने समाधि से बाहर आकर मुनि का स्वागत किया, तो अर्जन मुनि ने अत्यंत विनम्रता से अपनी आत्मिक शंका रखी: "हे रुद्रावतार! हे महावीर! आप स्वयं देवाधिदेव महादेव के रुद्र अंश हैं। फिर भी आप निरंतर 'राम-नाम' का जप और स्मरण क्यों करते हैं? शिव-तत्व और राम-तत्व में क्या अंतर है? किस भक्ति से जीव का शीघ्र कल्याण संभव है?" 3. हनुमान जी द्वारा शिव और राम-तत्व का प्रकटीकरण महर्षि अर्जन का यह निष्काम प्रश्न सुनकर हनुमान जी प्रसन्न हुए और मुस्कुराते हुए बोले: "हे मुनिश्रेष्ठ! जो अज्ञानी जन भगवान शिव और भगवान विष्णु (श्रीराम) में भेद देखते हैं, वे कभी मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकते। शिव ही राम हैं और राम ही शिव हैं।" हनुमान जी ने अर्जन मुनि को गूढ़ रहस्य समझाते हुए बताया: शिव का हृदय विष्णु हैं: भगवान शिव निरंतर अपने हृदय में श्रीहरि के राम स्वरूप का ध्यान करते हैं। काशी में मरते हुए प्राणी के कान में जो 'तारक मंत्र' शिव जी फूंकते हैं, वह 'राम' नाम ही है। विष्णु का हृदय शिव हैं: प्रभु श्रीराम अपने प्रत्येक कार्य से पहले और बाद में शिवलिंग की स्थापना कर महादेव की पूजा करते हैं (जैसे रामेश्वरम में)। अवतार का कारण: "मैं शिव जी का ही अंश (रुद्र) हूँ, किंतु केवल इस परम आनंद रस (राम-भक्ति) का स्वाद लेने और संसार को निष्काम सेवा का मार्ग दिखाने के लिए मैंने दास्य-भाव से हनुमान अवतार धारण किया है।" 4. अर्जन मुनि को उपदेश और दिव्य दर्शन हनुमान जी ने अर्जन मुनि को शिव-राम भक्ति का मुख्य सूत्र देते हुए कहा कि जो व्यक्ति शिव जी की पूजा करता है किंतु श्रीराम से द्वेष करता है, उसकी पूजा शिव जी कभी स्वीकार नहीं करते। ठीक उसी प्रकार जो राम-भक्त शिव जी का अनादर करता है, उसे राम कृपा कभी नहीं मिलती। संवाद के अंत में, हनुमान जी ने महर्षि अर्जन पर कृपा करते हुए उन्हें अपने वक्षस्थल (छाती) के भीतर साक्षात भगवान शिव और प्रभु श्रीराम को एक-दूसरे का ध्यान करते हुए दिव्य दर्शन कराया। 5. संवाद का फल हनुमान जी का यह उपदेश सुनकर अर्जन मुनि का संपूर्ण संशय मिट गया। उनका मन शिव और राम के अभिन्न रूप में लीन हो गया। हनुमान जी के आशीर्वाद से वे परम ज्ञान और भक्ति प्राप्त कर सिद्ध पुरुष बने। कथा का संदेश: हरि (विष्णु/राम) और हर (शिव) एक ही परमब्रह्म के दो स्वरूप हैं। जो साधक हनुमान जी के मार्ग पर चलकर दोनों के प्रति निष्काम भक्ति और आदर भाव रखता है, वही संसार के आवागमन से मुक्त होकर शिवलोक और साकेत धाम का अधिकारी बनता है।

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