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*श्री जगन्नाथ मंदिर के बाइसी पहाचा (22 सीढ़ियाँ)* पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर में बाइसी पहाचा, यानी 22 सीढ़ियों का एक बेहद महत्वपूर्ण स्थान है। ये सीढ़ियाँ मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार—सिंहद्वार (सिंहद्वार गुमुत) को भीतर के दूसरे द्वार (बाइसी पहाचा गुमुत) से जोड़ती हैं। हालांकि, ऐतिहासिक दस्तावेजों में इनके निर्माण के सटीक समय का कोई पुख्ता प्रमाण नहीं मिलता, लेकिन लोक मान्यताओं के अनुसार इनका निर्माण राजा भानुदेव ने करवाया था। संरचना और प्रतीकवाद सिंहद्वार से प्रवेश करते ही बाइसी पहाचा की शुरुआत होती है। मंदिर के मुख्य प्रांगण तक पहुँचने के लिए श्रद्धालुओं को इन सीढ़ियों को पार करके दूसरे प्रवेश द्वार तक जाना होता है। आकार: प्रत्येक सीढ़ी लगभग 70 फीट लंबी, 6 फीट चौड़ी और 6 से 7 इंच ऊँची यमशिला: इन सीढ़ियों में से तीसरी सीढ़ी का विशेष महत्व है, क्योंकि इसमें "यमशिला" नाम का एक पत्थर जड़ा हुआ है। ऐसी मान्यता है कि ऊपर चढ़ते समय इस शिला पर पैर रखने से भक्तों के उन पापों का नाश होता है जिसके लिए यमराज (मृत्यु के देवता) दंड देते हैं। लेकिन, मंदिर से दर्शन करके नीचे उतरते समय इस शिला पर पैर रखने की मनाही है, क्योंकि माना जाता है कि ऐसा करने से भगवान जगन्नाथ के दर्शन से मिला सारा पुण्य समाप्त हो जाता है। आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व बाइसी पहाचा केवल मंदिर के भीतर जाने का मार्ग नहीं है, बल्कि यह एक गहरा आध्यात्मिक अनुभव भी है: पवित्र गतिविधियाँ (महाप्रभु की पहंडी): रथ यात्रा के दौरान ऐसा माना जाता है कि सभी देवी-देवता, यक्ष, गंधर्व, पूर्वजों की आत्माएं, चित्रगुप्त और यमदूत इन सीढ़ियों पर आकर विराजमान होते हैं। वे सब यहाँ भगवान जगन्नाथ की भव्य 'पहंडी' (यात्रा/जुलूस) के दर्शन करने के लिए उतरते हैं। पिंड दान: इन सीढ़ियों के दोनों किनारों पर पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए वार्षिक पिंड दान (श्राद्ध कर्म) किया जाता है। माना जाता है कि यहाँ दिए गए अन्न से पितरों की आत्माएं तृप्त होती हैं। स्वयं भगवान जगन्नाथ के प्रतिनिधि स्वरूप मदन मोहन, अपने पूर्वजों और राजा इंद्रद्युम्न तथा रानी गुंडिचा जैसी महान ऐतिहासिक विभूतियों के सम्मान में इन सीढ़ियों पर पिंड दान की रस्म निभाते हैं। दीपावली का अनुष्ठान (बड़बाड़िया डाको): दीपावली के दिन श्रद्धालु यहाँ 'कौँरिया काठी' (पटसन की सूखी लकड़ियों का बंडल) जलाकर आकाश की ओर दिखाते हैं। इस परंपरा को 'बड़बाड़िया डाको' कहा जाता है, जिसका उद्देश्य पूर्वजों के मार्ग को आलोकित करना और उन्हें याद करना है। जैन धर्म से जुड़ाव: जैन धर्म के अनुयायी इन 22 सीढ़ियों को अपने 22 तीर्थंकरों का प्रतीक मानते हैं और इस स्थान के प्रति गहरी श्रद्धा रखते हैं। आत्म-नियंत्रण की सीढ़ियाँ: कुछ विद्वानों और संतों का मानना है कि ये 22 सीढ़ियाँ मानव जीवन की 22 बुराइयों और कमजोरियों को दर्शाती हैं। प्राचीन काल में कई संतों और वैष्णवों को इन विकारों पर विजय पाने में लगभग 22 वर्ष का समय लगा था, जिसके बाद ही वे भगवान जगन्नाथ के दर्शन के पात्र बन पाए। इसीलिए विद्वान इन्हें 'आत्म-नियंत्रण की सीढ़ियाँ' भी कहते हैं। प्रेत शिला: इसकी सातवीं सीढ़ी पर 'प्रेत शिला' या 'पितृशिला' नाम का एक पत्थर है। श्रद्धालु इस शिला पर भगवान जगन्नाथ का 'अन्न महाप्रसाद' छोड़ते हैं। माना जाता है कि इसे ग्रहण करने से भटकती हुई मृत आत्माओं को मुक्ति मिल जाती है।

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