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कुल्लू दशहरा की 5 अनसुनी कहानियाँ जो कोई नहीं बताता - सुनके रोंगटे खड़े हो जाएंगे जी! 🙏 ये भारत का इकलौता दशहरा है जहाँ *रावण नहीं जलता*! 1. राजा की एक गलती से शुरू हुआ - 370 साल पुराना श्राप 1660 में कुल्लू के राजा जगत सिंह ने टिपरी गाँव के एक गरीब ब्राह्मण दुर्गा दत्त से जमीन हड़पने की कोशिश की। ब्राह्मण ने गुस्से में अपने परिवार समेत आग में कूद कर जान दे दी। ब्रह्म-हत्या का दोष लगा और राजा को असाध्य रोग हो गया। कोई वैद्य ठीक नहीं कर पाया। 2. अयोध्या से चोरी लाई गई थी मूर्ति! पयहारी बाबा ने कहा - अयोध्या के त्रेतानाथ मंदिर से रघुनाथ जी की मूर्ति लाओ, तभी मुक्ति मिलेगी। बाबा दामोदर दास अयोध्या गए, पर पुजारी मूर्ति देने को तैयार नहीं थे। कहते हैं बाबा ने मूर्ति को टोकरी में छुपा कर चोरी से कुल्लू ले आए! 1653 में मणिकर्ण में रखी, 1660 में कुल्लू महल में स्थापित की और राजा ने अपना पूरा राज-पाट रघुनाथ जी को सौंप दिया, खुद सेवक बन गए। 3. रावण क्यों नहीं जलता? यहाँ घास जलती है! कुल्लू में रावण दहन नहीं होता। सातवें दिन ब्यास नदी किनारे सूखी घास, झाड़ियों और लकड़ियों को जला कर *"लंका दहन"* का प्रतीक मनाया जाता है। मान्यता है - पहले राम जी ने दुर्गा पूजन किया, दशमी को लंका पर चढ़ाई की, पर रावण मरा पूर्णिमा को। इसलिए पहले पूर्णिमा को लंका जलाते थे, अब सातवें दिन जलाते हैं। 4. बिजली महादेव के बिना रथ हिलता ही नहीं! रघुनाथ जी के विशाल लकड़ी के रथ की रस्सी खींचना पुण्य माना जाता है। पर रथ तब तक नहीं हिलता जब तक *बिजली महादेव* हाजिरी नहीं भरते। वो रथ के बाएँ-पीछे बैठते हैं। ये नियम आज तक टूटा नहीं है। 5. हडिम्बा माता की हाजिरी सबसे पहले! ढालपुर मैदान का दशहरा तभी शुरू होता है जब मनाली से *माता हडिम्बा* 40 किमी पैदल चल कर कुल्लू आती हैं। 300 से ज्यादा देवी-देवता अपनी पालकियों में सवार होकर रघुनाथ जी को सलाम करने आते हैं - इसे देवताओं का महाकुंभ कहते हैं। जब पूरे भारत में दशहरा खत्म होता है, तब कुल्लू में शुरू होता है! > *अनसुनी बात:* कहते हैं इस मेले को देखने देवता खुद धरती पर उतरते हैं। रथ की रस्सी छूने से सारे पाप खत्म हो जाते हैं! जय रघुनाथ जी 🙏

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