
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
142 days ago
10.4.2026 कुछ लोग कुछ शास्त्रों को पढ़कर अभिमानी हो जाते हैं, और यह समझते हैं, कि *"अब हम पूर्ण विद्वान बन गए।" "जबकि उन पढ़ी सुनी बातों पर वे लोग आचरण नहीं करते।"* तो केवल शब्द ज्ञान प्राप्त करके व्यक्ति को मिथ्या संतोष नहीं कर लेना चाहिए, कि *"मैंने बहुत सीख लिया है," "जब तक उन बातों को वह आचरण में न उतार ले।"* *"शाब्दिक ज्ञान से आचरण सदा उत्तम होता है। शाब्दिक ज्ञान तो रावण के पास भी बहुत था। परंतु वह ज्ञान उसके आचरण में नहीं उतरा, इसलिए फलीभूत नहीं हुआ।" "श्री रामचंद्र जी महाराज ने वेदों का अध्ययन किया। शब्द शास्त्र भी पढ़ा, और उसे आचरण में भी उतारा। इसलिए वे सफल हो गए। और आज तक संसार के लोग उनका सम्मान कर रहे हैं।"* *"अतः शाब्दिक ज्ञान से संतुष्ट न हो जाएं।श्री रामचंद्र जी महाराज के समान उसे अपने जीवन में भी उतारें, तभी आपका कल्याण होगा, अन्यथा नहीं।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*

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