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🕉️श्री कृष्ण द्वारा द्वारका की रक्षा की अद्भुत लीला 🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕 द्वापर युग में मथुरा नगरी लगातार संकटों से घिरी हुई थी। मगध का अत्यंत शक्तिशाली राजा जरासंध बार-बार विशाल सेना लेकर मथुरा पर आक्रमण करता था। उसका एक ही उद्देश्य था — श्री कृष्ण और यादव वंश का पूर्ण विनाश। हर बार भगवान श्रीकृष्ण और बलराम उसकी सेना को पराजित कर देते, लेकिन लगातार युद्धों के कारण मथुरा की प्रजा भय और अशांति में जीने लगी थी। तब श्रीकृष्ण ने समझा कि केवल शत्रु को हराना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि अपनी प्रजा की रक्षा करना ही सच्चा धर्म है। इसीलिए उन्होंने एक अद्भुत निर्णय लिया। उन्होंने समुद्र देव से प्रार्थना की और समुद्र के मध्य एक नई नगरी बसाने का संकल्प लिया। भगवान के आदेश पर दिव्य शिल्पकार विश्वकर्मा ने समुद्र के भीतर एक अद्भुत स्वर्णिम नगरी का निर्माण किया — वही दिव्य नगरी थी “द्वारका”। उस नगरी के महल सोने समान चमकते थे, मार्ग रत्नों से सजे थे और चारों ओर समुद्र उसकी रक्षा करता था। फिर एक रात श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया से मथुरा के समस्त लोगों को सुरक्षित रूप से द्वारका पहुँचा दिया। जब शत्रुओं ने मथुरा पर आक्रमण किया, तब उन्हें वहाँ कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ। लेकिन संकट अभी समाप्त नहीं हुआ था। कुछ समय बाद कालयवन नामक एक अत्यंत भयंकर योद्धा विशाल सेना लेकर श्रीकृष्ण को मारने आया। वह इतना शक्तिशाली था कि यदि युद्ध होता, तो असंख्य निर्दोष लोगों का विनाश निश्चित था। तब श्रीकृष्ण ने अपनी अद्भुत बुद्धि और रणनीति का परिचय दिया। वे युद्ध किए बिना कालयवन को एक गुफा तक ले गए, जहाँ महान राजा मुचुकुंद गहरी निद्रा में तपस्या कर रहे थे। उन्हें यह वरदान प्राप्त था कि जो भी उनकी नींद भंग करेगा, वह उनकी दृष्टि पड़ते ही भस्म हो जाएगा। अंधेरे में कालयवन ने मुचुकुंद को ही श्रीकृष्ण समझ लिया और क्रोध में उन्हें लात मार दी। जैसे ही राजा मुचुकुंद की आँखें खुलीं, उनकी दिव्य अग्नि-दृष्टि से कालयवन उसी क्षण भस्म हो गया। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने बिना बड़े युद्ध और रक्तपात के अपनी प्रजा की रक्षा कर ली। इस लीला से मिलने वाली सीख सच्चा नेता वही होता है जो अपने लोगों की सुरक्षा को सबसे ऊपर रखे। केवल बल ही नहीं, बुद्धि और रणनीति भी सबसे बड़ी शक्ति होती है। धर्म की रक्षा के लिए कभी-कभी युद्ध से अधिक आवश्यक होती है सही योजना। भगवान श्रीकृष्ण केवल महान योद्धा ही नहीं, बल्कि अद्भुत नीति-ज्ञानी और रक्षक भी थे। द्वारका की यह लीला हमें सिखाती है कि सच्ची विजय वही है जिसमें अपने लोगों की रक्षा हो और अनावश्यक विनाश न हो।🙏🚩

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