
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
148 days ago
॥श्री गोस्वामी तुलसीदासजी रचित॥ समुझत सरिस नाम अरु नामी। प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी॥ नाम रूप दुइ ईस उपाधी। अकथ अनादि सुसामुझि साधी॥ भावार्थ:- समझने में नाम और नामी दोनों एक से हैं, किन्तु दोनों में परस्पर स्वामी और सेवक के समान प्रीति है (अर्थात् नाम और नामी में पूर्ण एकता होने पर भी जैसे स्वामी के पीछे सेवक चलता है, उसी प्रकार नाम के पीछे नामी चलते हैं। प्रभु श्री रामजी अपने 'राम' नाम का ही अनुगमन करते हैं (नाम लेते ही वहाँ आ जाते हैं)। नाम और रूप दोनों ईश्वर की उपाधि हैं, ये (भगवान के नाम और रूप) दोनों अनिर्वचनीय हैं, अनादि हैं और सुंदर (शुद्ध भक्तियुक्त) बुद्धि से ही इनका (दिव्य अविनाशी) स्वरूप जानने में आता है।। 🌷🌞॥जय श्रीराम॥🌞🌷

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