MyMandirInstall

**कांवड़ यात्रा** (जिसे आमतौर पर 'कांवड़' कहा जाता है) की शुरुआत और इसके इतिहास को लेकर पौराणिक कथाओं में कई मान्यताएं प्रचलित हैं। ### 1. क्या इसकी शुरुआत रावण ने की थी? हाँ, पौराणिक लोक-कथाओं और मान्यताओं के अनुसार, **लंकापति रावण** को **पहला कांवड़िया** माना जाता है। * **पौराणिक कथा:** कथा के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान निकले हलाहल विष को जब भगवान शिव ने अपने कंठ में धारण कर लिया था, तब उनके शरीर में उसकी तीव्र जलन (ऊष्मा) बढ़ गई थी। शिवजी के अनन्य भक्त रावण ने उनकी इस पीड़ा को शांत करने के लिए अपनी तपोबल और योग शक्ति से कांवड़ में गंगाजल भरा। * रावण ने पैदल चलकर उत्तर प्रदेश के बागपत स्थित **'पुरा महादेव'** मंदिर में उस गंगाजल से भगवान शिव का जलाभिषेक किया था, जिससे शिवजी के कंठ की जलन शांत हुई। इसी घटना को कांवड़ यात्रा और जलाभिषेक की परंपरा की पहली शुरुआत माना जाता है। ### 2. कांवड़ यात्रा की शुरुआत से जुड़ी अन्य प्रमुख मान्यताएं: रावण के अलावा, हिंदू पौराणिक ग्रंथों और लोक-व्यवहार में कुछ अन्य महान पात्रों का भी जिक्र मिलता है जिन्होंने इस परंपरा को आगे बढ़ाया: * **श्रवण कुमार:** त्रेतायुग में ही जब श्रवण कुमार अपने अंधे माता-पिता को तीर्थ यात्रा पर ले जा रहे थे, तब उन्होंने उन्हें अपने कंधे पर बांस की बहंगी (कांवड़) नुमा टोकरी में बैठाया था। कई विद्वान मानते हैं कि कंधे पर कांवड़ रखकर चलने की वैचारिक शुरुआत यहीं से हुई थी। * **भगवान परशुराम:** एक अन्य कथा के अनुसार, परशुराम जी ने गढ़मुक्तेश्वर से कांवड़ में गंगाजल भरकर उत्तर प्रदेश के पुरा महादेव मंदिर में शिवलिंग का अभिषेक किया था और कठोर तपस्या की थी। ### ऐतिहासिक प्रमाण: यदि पौराणिक कथाओं से हटकर ऐतिहासिक दस्तावेजों की बात करें, तो 17वीं-18वीं शताब्दी (ब्रिटिश काल के आसपास) के साहित्य और इतिहास में इसका लिखित प्रमाण मिलता है, जब मुख्य रूप से पूर्वी भारत (जैसे सुल्तानगंज से देवघर) के बीच यह यात्रा संतों और भक्तों द्वारा बड़े पैमाने पर की जाने लगी थी। समय के साथ यह परंपरा देश की सबसे बड़ी और लोकप्रिय आध्यात्मिक यात्राओं में बदल गई।

Comments (0)

No comments yet. Be the first to comment!