
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
13 days ago
*🌹देवी-देवताओं की मूर्ति पूजना चाहिए या नहीं?🌹* 💐💐💐💐💐💐💐💐💐 *🚩।।ॐ।। ।।यो भूतं च भव्य च सर्व यश्चाधितिष्ठति।* *स्वर्यस्य च केवलं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नम:।।-अथर्ववेद 10-8-1* *•भावार्थ:-* जो भूत, भविष्य और सबमें व्यापक है, जो दिव्यलोक का भी अधिष्ठाता है, उस ब्रह्म (परमेश्वर) को प्रणाम है। वहीं हम सब के लिए प्रार्थनीय और वही हम सबके लिए पूज्जनीय है। *•उत्तर:-* जैन, हिन्दू, बौद्ध, सिख, ईसाई का एक धड़ा मूर्ति पूजा को नहीं मानता है। हिन्दुओं में आर्य समाज और वैदिक समाज प्रतिमा पूजा का विरोधी है। मजारों या कब्रों को पूजना भी मूर्ति पूजा का ही दूसरा रूप है। इस तरह हम देखते हैं कि विश्व की आधे से ज्यादा जनसंख्या मूर्तिपूजक है। पंचभूतों से निर्मित किसी भी आकार-प्रकार पर श्रद्धा स्थिर करना मूर्तिपूजा है। किसी भी देव या पवित्र स्थल की परिक्रमा करना या उसके समक्ष झुकना मूर्ति पूजा ही है। कौन मूर्तिपूजक नहीं है? ईश्वर की कोई मूर्ति बनाई नहीं जा सकती इसीलिए सिर्फ देवी और देवताओं की ही मूर्तियां बनती है। ऐसे कई स्थान हैं जहां पर देवी या देवता जाग्रत रूप से विद्यमान हैं। वहां उनकी मूर्ति नहीं भी होगी तो भी वे होंगे। ऐसे सभी स्थानों को हम वैदिक बनकर उनके खिलाफ नहीं जा सकते, क्योंकि वे सभी भी ईश्वर की ओर से हैं। यदि हम हिन्दुओं को दो हिस्से में बांट दें, तो एक को कहेंगे वैदिक और दूसरे को कहेंगे पौराणिक। जो पौराणिक हैं वे सभी मूर्तिपूजक हैं। ओशो कहते हैं कि मूर्ति-पूजा का सारा आधार इस बात पर है कि आपके मस्तिष्क में और विराट परमात्मा के मस्तिष्क में संबंध हैं। दोनों के संबंध को जोड़ने वाला बीच में एक सेतु चाहिए। संबंधित हैं आप, सिर्फ एक सेतु चाहिए। वह सेतु निर्मित हो सकता है, उसके निर्माण का प्रयोग ही मूर्ति है। और निश्चित ही वह सेतु मूर्त ही होगा, क्योंकि आप अमूर्त से सीधा कोई संबंध स्थापित न कर पाएंगे। ये मंदिर व मूर्तियां आध्यात्मिक देश भारत में अध्यात्म की शिशु कक्षाएं हैं। *🚩मूर्तिपूजा का पक्ष:-* मूर्तिपूजा के समर्थक कहते हैं कि ईश्वर तक पहुंचने में मूर्तिपूजा रास्ते को सरल बनाती है। मन की एकाग्रता और चित्त को स्थिर करने में मूर्तिपूजा से सहायता मिलती है। मूर्ति को आराध्य मानकर उसकी उपासना करने और फूल आदि अर्पित करने से मन में विश्वास और खुशी का अहसास होता है। इस विश्वास और खुशी के कारण ही मनोकामना की पूर्ति होती है। विश्वास और श्रद्धा ही जीवन में सफलता का आधार है। प्राचीन मंदिर ध्यान या प्रार्थना के लिए होते थे। उन मंदिरों के स्तंभों या दीवारों पर ही मूर्तियां आवेष्टित की जाती थीं। मंदिरों में पूजा-पाठ नहीं होता था। यदि आप खजुराहो, कोणार्क या दक्षिण के प्राचीन मंदिरों की रचना देखेंगे तो जान जाएंगे कि ये मंदिर किस तरह के होते हैं। ध्यान या प्रार्थना करने वाली पूरी जमात जब खत्म हो गई है तो इन जैसे मंदिरों पर पूजा-पाठ का प्रचलन बढ़ा। पूजा-पाठ के प्रचलन से मध्यकाल के अंत में मनमाने मंदिर बने। मनमाने मंदिर से मनमानी पूजा-आरती आदि कर्मकांडों का जन्म हुआ, जो वेदसम्मत नहीं माने जाते हैं। 'जड़ (मूल) ही सबका आधार हुआ करती है। जड़ सेवा के बिना किसी का भी कार्य नहीं चलता। दूसरे की आत्मा की प्रसन्नतापूर्वक उसके आधारभूत जड़ शरीर एवं उसके अंगों की सेवा करनी पड़ती है। परमात्मा की उपासना के लिए भी उसके आश्रयस्वरूप जड़ प्रकृति की पूजा करनी पड़ती है। हम वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, प्रकाश आदि की उपासना में प्रचुर लाभ उठाते हैं, तब मूर्तिपूजा से क्यों घबराना चाहिए? उसके द्वारा तो आप अणु-अणु में व्याप्त चेतन (सच्चिदानंद) की पूजा कर रहे होते हैं। आप जिस बुद्धि या मन को आधारभूत करके परमात्मा का अध्ययन कर रहे होते हैं, क्यों वे जड़ नहीं हैं? परमात्मा भी जड़ प्रकृति के बिना कुछ नहीं कर सकता, सृष्टि भी नहीं रच सकता। तब सिद्ध हुआ कि जड़ और चेतन का परस्पर संबंध है। तब परमात्मा भी किसी मूर्ति के बिना उपास्य कैसे हो सकता है? *🪔क्या कहते हैं वेद...* 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 यह सही है कि सृष्टि की सबसे पुरानी पुस्तक वेद में एक निराकार ईश्वर की उपासना का ही विधान है। चारों वेदों के लगभग मूल 20,589 मंत्रों में कोई ऐसा मंत्र नहीं है, जो मूर्ति पूजा का पक्षधर हो, लेकिन फिर भी मूर्ति पूजा करना कोई अपराध नहीं है यह सिर्फ अज्ञान है। देवी या देवताओं की कुछ खास स्थान पर की जा रही मूर्ति पूजा को अनुचित ठहराना कही से भी उचित नहीं है। ऐसे कुछ स्थानों को छोड़कर बाकी जगह पर मूर्ति का होने क्या उचित हैं? *🚩न तस्य प्रतिमाsअस्ति यस्य नाम महद्यस:। -(यजुर्वे

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