
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
143 days ago
बैसाखी का दिन भारतीय इतिहास और विशेष रूप से सिख धर्म के लिए अत्यंत गौरवशाली और महत्वपूर्ण है। 13 अप्रैल 1699 को गुरु गोविंद सिंह जी ने आनंदपुर साहिब में **खालसा पंथ** की स्थापना की थी, जो वीरता, त्याग और समानता का प्रतीक बना। ### खालसा पंथ का इतिहास और 'महान कुर्बानी' हाँ, बैसाखी को एक बहुत बड़ी कुर्बानी और समर्पण का दिन माना जाता है। इसके पीछे की कहानी साहस की एक अद्भुत मिसाल है: * **धर्म की रक्षा का संकल्प:** 1699 की बैसाखी पर गुरु गोविंद सिंह जी ने एक सभा बुलाई। उन्होंने अपनी तलवार निकालते हुए पूछा, "क्या यहाँ कोई ऐसा है जो धर्म की रक्षा के लिए अपना सिर दे सके?" * **पंज प्यारे:** गुरु साहिब के इस आह्वान पर एक-एक करके पांच लोग (दया राम, धर्म दास, हिम्मत राय, मोहकम चंद और साहिब चंद) आगे आए। वे अलग-अलग जातियों और क्षेत्रों से थे। गुरु जी ने उन्हें **'पंज प्यारे'** का नाम दिया। * **अमृत छकना:** गुरु जी ने लोहे के पात्र में जल और चीनी के दाने (पताशे) मिलाकर खंडों (दुधारी तलवार) से उसे हिलाते हुए 'अमृत' तैयार किया। उन्होंने पहले पंज प्यारों को अमृत छकाया और फिर स्वयं उनके हाथों से अमृत ग्रहण किया, जिससे यह संदेश गया कि गुरु और शिष्य में कोई भेद नहीं है। ### खालसा के पांच प्रतीक (5 K's) गुरु गोविंद सिंह जी ने खालसा सिखों के लिए पांच अनिवार्य पहचान चिह्न निर्धारित किए, जिन्हें **'ककार'** कहा जाता है: 1. **केश:** परमात्मा की देन का सम्मान करने के लिए बिना कटे बाल। 2. **कंगा:** स्वच्छता और व्यवस्था का प्रतीक। 3. **कड़ा:** ईश्वर के साथ अनंत जुड़ाव और आत्म-संयम। 4. **कछैरा:** उच्च चरित्र और शुचिता का प्रतीक। 5. **कृपाण:** आत्मरक्षा और मजलूमों (कमजोरों) की रक्षा के लिए। ### बैसाखी का संदेश बैसाखी केवल फसल कटाई का उत्सव नहीं है, बल्कि यह **जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने** और **मानवता की सेवा** के लिए खुद को समर्पित करने का दिन है। गुरु गोविंद सिंह जी ने खालसा को एक ऐसी फौज के रूप में तैयार किया जो बिना किसी भेदभाव के समाज की रक्षा करे। > **"सवा लाख से एक लड़ाऊँ, चिड़ियन ते मैं बाज तुड़ाऊँ, तबै गोबिंद सिंह नाम कहाऊँ।"** > यह दिन हमें याद दिलाता है कि जब समाज में अन्याय बढ़ता है, तो साहस और एकता ही सबसे बड़ी शक्ति होती है।
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