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✨🌸मधुमंगल की मटकी🌸✨ ब्रज की गलियों में एक सखा थे, सबसे प्यारे – मधुमंगल कान्हा के इतने लाडले कि बिना उनके कृष्ण का दिन ही अधूरा लगता था। एक दिन गाय चराते-चराते कान्हा बोले – “कल सब अपने-अपने घर से प्रसादी लेकर आना… आज मैं तुम सबके घर का भोग चखूँगा।” बस फिर क्या था! सारे सखा खुशी से झूम उठे – “आज तो लाला खुद माँग रहे हैं!” घर पहुँचते ही सबने ऐलान कर दिया – “मैया! कल सबसे बढ़िया भोग बनाना… लाला हमारी प्रसादी खायेंगे!” पूरे ब्रज में प्रेम की रसोई सज गयी… मैयाओं ने रात से ही पकवान बनाने शुरू कर दिए लेकिन… एक कोने में मधुमंगल चुप थे। घर की हालत जानते थे… कैसे कहते मैया से? बस रात भर करवट बदलते रहे… मन में एक ही बात – “क्या ले जाऊँ अपने गोविंद के लिए?” सुबह मैया ने जगाया… संकोच से पूछा – “मैया… कुछ प्रसाद बनायो है का?” मैया बोली – “बेटा, बस परसों की बची छाछ की कढ़ी रखी है मटकी में…” ये सुनते ही बालमन टूट सा गया… पर कृष्ण के दर्शन बिना चैन कहाँ! मटकी उठाई… और चल पड़े वन की ओर। उधर सारे सखा स्वादिष्ट पकवान लेकर बैठे थे, पर कान्हा की आँखें तो बस एक ही को ढूँढ रही थीं… “मेरा मधु कहाँ है?” जैसे ही दूर से आते देखा… कान्हा उछल पड़े – “आ गयो! देखो मेरो मधु आय गयो! हम तो तेरी प्रसादी का इंतजार ही कर रहे थे!” मधुमंगल शर्म से मटकी पीछे छुपाने लगे… पर सखा के प्रेम को क्या छुपाया जा सकता है? कृष्ण ने झट से मटकी छीन ली… और भोग लगाने लगे… और फिर… चमत्कार!!! ✨ जिस मटकी में सिर्फ साधारण कढ़ी थी, वही मटकी अब तरह-तरह के दिव्य पकवानों से भर चुकी थी…! मधुमंगल स्तब्ध… और कान्हा के होंठों पर वही मृदुल मुस्कान… संदेश: भगवान को भोग का वैभव नहीं, भक्ति का भाव प्रिय है। जहाँ प्रेम सच्चा हो, वहाँ खाली मटकी भी कृपा से भर जाती है…

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