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राधे-राधे! प्रेमानंद महाराज जी के विचारों और सत्संग के प्रकाश में आपकी बात बहुत गहरी और विचारणीय है। महाराज जी अक्सर समझाते हैं कि भगवत धाम (गोलोक या साकेत लोक) कोई भौतिक स्थान नहीं है जहाँ माया का प्रवेश हो सके। वहाँ केवल वही प्रवेश पा सकता है जिसका हृदय पूरी तरह शुद्ध हो चुका हो। यहाँ कुछ मुख्य बिंदु हैं जो महाराज जी के प्रवचनों का सार हैं: १. भगवत धाम में पाप की गुंजाइश क्यों नहीं है? भगवत धाम में केवल 'विशुद्ध सत्त्व' होता है। वहाँ काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसी वृत्तियाँ नहीं होतीं। जब तक मनुष्य के भीतर पाप करने की इच्छा (अविद्या) रहती है, तब तक उसे इस मृत्युलोक के चक्र में रहना पड़ता है। धाम में केवल वही जाता है जो प्रभु की शरणागति पा चुका हो। २. धाम जाने की योग्यता महाराज जी कहते हैं कि नाम जप और गुरु की कृपा से जब अंतःकरण निर्मल हो जाता है, तभी जीव धाम का अधिकारी बनता है। "पाप आचरण" तो दूर की बात है, वहाँ भगवान की सेवा के अतिरिक्त कोई दूसरी इच्छा ही शेष नहीं रहती। ३. इस लोक में कैसे बचें? यदि हम चाहते हैं कि हमसे पाप आचरण न हो, तो महाराज जी के बताए इन तीन स्तंभों को अपनाना चाहिए: * नाम जप: निरंतर राधा-नाम या अपने इष्ट का नाम जपते रहें। नाम की अग्नि सारे पापों और पाप-वृत्तियों को जला देती है। * सत्संग: अच्छे विचारों को सुनें ताकि बुद्धि भ्रमित न हो। * परमार्थ: दूसरों में भी भगवान का रूप देखें। जब हम सबको प्रभु का रूप मानेंगे, तो किसी का अहित करने का विचार ही नहीं आएगा। निष्कर्ष: भगवत धाम 'प्रेम' का स्वरूप है। जहाँ प्रेम होता है, वहाँ स्वार्थ या पाप टिक ही नहीं सकता। जो यहाँ जीते-जी अपने हृदय को मंदिर बना लेता है, उसके लिए यह संसार ही भगवत धाम के समान सुखद हो जाता है।

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