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बुढ़ानीलकंठ नारायण* की मूर्ति है, नेपाल की काठमांडू घाटी में स्थित है। इसे "स्लीपिंग विष्णु" भी कहते हैं। *50000 किलो की मूर्ति पानी में कैसे तैर रही है?* 1. *तैर नहीं रही, पानी में लेटी है* मूर्ति असल में तैर नहीं रही। ये एक बड़े पत्थर के टैंक/कुंड के अंदर पानी में लेटी हुई है। मूर्ति का आधार और नीचे का हिस्सा टैंक के तल पर टिका है। ऊपर से देखने पर लगता है जैसे मूर्ति पानी पर तैर रही हो। 2. *बनी कैसे है?* ये मूर्ति एक ही काले बेसाल्ट पत्थर को तराशकर बनाई गई है। इसकी लंबाई लगभग 5 मीटर है। पानी का लेवल मूर्ति के छाती तक रखा जाता है, इसलिए ऐसा लगता है कि भगवान शेषनाग पर लेटे हुए पानी में तैर रहे हैं। 3. *भ्रम क्यों होता है?* कुंड का पानी स्थिर रहता है और मूर्ति के नीचे का आधार पानी में डूबा होता है। बाहर से देखने पर किनारे नहीं दिखते, इसलिए ऑप्टिकल इल्यूजन बनता है कि विशाल मूर्ति पानी पर तैर रही है। ये मूर्ति 5वीं शताब्दी की मानी जाती है और नेपाल में विष्णु भक्तों के लिए सबसे पवित्र जगहों में से एक है। हर शनिवार यहाँ बड़ी भीड़ होती है। *बुढ़ानीलकंठ मंदिर - इतिहास और मान्यता* 1. *स्थान और नाम* - काठमांडू से लगभग 8 किमी उत्तर में, शिवपुरी पहाड़ी की तलहटी में स्थित है। - "बुढ़ानीलकंठ" का अर्थ है - _बूढ़े नीलकंठ_, यानी शिव रूप में विष्णु। यहाँ विष्णु भगवान शेषनाग पर योगनिद्रा में लेटे हुए हैं। 2. *इतिहास* - मूर्ति 5वीं शताब्दी की मानी जाती है, लिच्छवी वंश के राजा विष्णु गुप्त के समय की। - ये एक ही काले बेसाल्ट पत्थर से बनी है। कैसे इतनी बड़ी मूर्ति यहाँ तक लाई गई, ये आज भी रहस्य है। - मान्यता है कि मूर्ति अपने आप प्रकट हुई थी। स्थानीय लोग इसे "जल से निकली मूर्ति" कहते हैं। 3. *धार्मिक मान्यता* - *योगनिद्रा में विष्णु*: भगवान विष्णु क्षीर सागर में शेषनाग पर लेटे हुए सृष्टि के पालन की नींद में हैं। पानी को क्षीर सागर का प्रतीक माना जाता है। - *नेपाल के राजा यहाँ नहीं आते*: एक मान्यता है कि अगर नेपाल का राजा इस मूर्ति के दर्शन करे तो उसका राज खतरे में पड़ जाता है। इसीलिए शाही परिवार यहाँ सार्वजनिक दर्शन नहीं करता। - *शनिवार का महत्व*: शनिवार को विष्णु का दिन माना जाता है। इस दिन यहाँ हजारों भक्त जल, फूल और दीप चढ़ाने आते हैं। 4. *खास बात* - मूर्ति 5 मीटर लंबी है और 13 कुंडली वाले शेषनाग पर लेटी है। - पानी हमेशा साफ रहता है, और कहा जाता है कि इसका स्रोत भूमिगत है। - बगल में एक छोटी शिवलिंग भी है, इसीलिए इसे विष्णु और शिव दोनों का रूप माना जाता है। सीधी बात - ये जगह सिर्फ मूर्ति नहीं, भक्ति और रहस्य का संगम है। पानी में लेटे हुए भगवान को देखकर लगता है जैसे वो ब्रह्मांड की नींद में हों

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