
SHREE SHARMA
461 days ago
[[[नमःशिवाय]]] श्री गुरूवे नमः #महामाया_का_मायाजाल यह कितनी विचित्र बात है कि मनुष्य प्रति दिन अनेकों को जन्म लेते व मृत्यू को प्राप्त होते देखता है । और जीवन मृत्यु के शाश्वत सत्य को समझता है और मानता है, परन्तु यह जानना नही चाहता है कि वह क्या है कौन है कहां से आया है । उसकी अनुभूति एवं चेतना या क्या रहस्य है? इस प्रकृति का क्या रहस्य है, वह इन सारी बातो को निरर्थक समझता है । उसको इससे महत्त्वपूर्ण और आकर्षक यह विश्व लगता है यह प्रकृति लगती है । वह अपने आस पास ये वातावरण को भोगने मे लग जाता है ,उसकी अनुभूतियां उसकी कामनाएं जगाती है ।और वह उन कामनाओं को पूर्ण करने के लिए प्रत्येक क्षण दुखी और व्याकुल रहता है। एक कामना पुर्ण होती है, तो दुसरी उत्पन्न हो जाती है और वह अपना पुरा जीवन इन्ही पूर्ति मे लगा देता है। इस प्रकृति के बारे मे अपने बारे मे अपने अन्दर उत्पन्न होने वाली चेतना और संज्ञान को बारे मे कुछ जानने का प्रयत्न ही नही करता। वह अज्ञानता के अन्धकार मे ही उत्पन्न होता है और उसी अन्धकार मे नष्ट हो जाता है । प्रकृति मे जन्म लेकर इसे भोगते हुए भी वह इसके बारे मे एवं अपने बारे मे कुछ भी नही जानता। अगर हम उपर्युक्त कथन कि गम्भीरता से विश्लेषण करे तो इसे सत्या पायेगे जीव, चेतना, और प्रकृति इसकी विचित्रता के कारणों को तलाशने कि प्रयत्न कौन करता है । जीव को अपनी भोग कामनाओं से ही फुरसत नही होती है हमारे ऋषि मुनियों ने कहा है कि जीव की प्रकृति बडी ही विचित्र होती है वह जानता है कि घर में आग लगी है और वह इसी आग मे जल जायेगा । वह यह भी जानता है कि नष्ट हो जाना उसकी नियति है, परन्तु वह अपने को शाश्वत मानकर सारे क्रिया कलाप करता है । इस प्रकृति मे कुछ भी शाश्वत नही है, यह जानते हुए भी अपने को जीवित रखने के लिए न जाने क्या क्या करता है स्वयं ये अस्तित्व को शाश्वत बनाने के लिए किले बनवाया है धर्मशालाएं सड़कें कुए मन्दिर और न जाने क्या क्या बनवाता है स्वयं की प्रशस्ति में पुस्तकें लिखवाता है। फिर इस जगत को छोड़कर चला जाता है। इस मै के अहंकार मे ही युद्धों संघर्षों और बर्बरता को अपनाकर पशु बन जाता है फिर भी स्वमं को शाश्वत नही रख पाता है। भला इस रहस्यमय प्रकृति ब्रह्माण्ड मे कुछ शाश्वत है ।इस पृथ्वी प्राचीन ऋषियों की पृथ्वी का अर्थ कुछ और है यहां वह अर्थ नही है । आधुनिक अर्थ है पृथ्वी नामक ग्रह कि अस्तित्व ही नगण्य है फिर इससे किसी क्षुद्र जीव ये इतिहास का मुल्य ही क्या है । जब कोई जीव जन्म लेता है तो उसकी इन्द्रियों बाह्य जगत के संकेतों को ग्रहण करके उस तक पहुँचाती है। इन संकेतों के कारण उसमें अनुभूतियां उत्पन्न होती है और ये इतनी मनमोहक होती है । जीव उन अनुभूतियों को राग मे पड जाता है और अपने आस पास के वातावरण को भोगने लग जाता है। इसके बाद उसे सोचने का मौका ही नही मिलता कि वह सत्य कि तलाश के बारे मै विचार कर सकें। किन्तु जीव जिस जगत मे विचरण करता है । उसकी कोई वास्तविक सत्ता होती ही नही वह सम्पूर्ण जगत उसकी अनुभूतियों का जगत होता है और अनुभूतियां इन्द्रियों ये संकेतों के कारण उत्पन्न होती है । इन इन्द्रियों सी क्षमता अत्यन्त न्युन होती है ।आधूनिक विज्ञान की भाषा मे कहा जाये , तो इनकी फ्रीक्वेंसी निर्धारित होती है । ये उसके दायरे से बाहर के सत्य को नही बता सकतीं एक वातावरण ,एक जैसे पर्यावरण के जीवों की इन्द्रिय सामर्थ्य में अन्तर कम होता है नस्लों में वह एक जैसा होता है । इसलिए सबकी अनुभूतियां लगभग एक जैसी होती हैऔर उन अनुभूतियों का जगत सत्य लगने लगता है ।
Comments (2)

Rama Devi Sahu
May 26, 2025
Radhey Radhey ❤️ Jii 🙏🌹🌹
