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. “मानसी गंगा लीला” एक बार राधारानीजी अपनी सखियों के साथ माखन लेकर मानसी गंगा के तट पर आईं। मानसी गंगा में बहुत पानी है। राधाजी सोचने लगीं–‘कैसे पार करेंगी मानसी गंगा को।’ तभी कृष्ण नाविक का भेष बदलकर आ गए और बोले–‘नाव से पार करा देता हूँ।’ गोपियो ने कहा–‘बहुत भला नाविक है।’ सभी सखियाँ और राधारानी नाव में बैठ गये। कृष्ण मन-ही-मन सोचने लगे–‘आज आनन्द आएगा।’ कृष्ण ने नाव चलना आरम्भ किया। थोड़ी देर बाद कृष्ण बोले–‘मुझे भूख लग रही कुछ खिलाओ नहीं तो मैं नाव नहीं चला पाऊँगा, सब डूब जाओगी।’ सखियों ने अपना सब माखन कृष्ण को दे दिया, और कृष्ण सब खा गये। फिर नाव चलना शुरू किया। थोड़ी देर बाद कृष्ण बोले–‘मैं थक गया हूँ, मेरे पैर दबाओ तभी नाव चला पाऊँगा।’ सखियाँ पैर दबाने लगीं बहुत सेवा की, जब नाव बीच में पहुँची, तो कृष्ण ने नाव जोर से हिला दी। सब गोपियाँ डर गयीं। कृष्ण बोले–‘मेरी नाव पुरानी है वजन ज्यादा है, डूब जायेगी, अपनी मटकी मानसी गंगा में फेंक दो।’ ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पढ़ने के लिये हमारा फेसबुक पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ को लाईक एवं फॉलो करें। अब आप हमारी पोस्ट व्हाट्सएप चैनल पर भी देख सकते हैं। चैनल लिंक हमारी फेसबुक पोस्टों में देखें। जल्दी-जल्दी, गोपियों ने अपनी मटकियाँ मानसी गंगा में डाल दीं। कृष्ण फिर बोले–‘अभी भी नाव हिल रही है, डूब जायेगी, अपने गहने भी फेंक दो, नहीं तो डूब जाओगी।’ सबने अपने बहुमूल्य गहने भी मानसी गंगा में फेंक दिए। फिर ठाकुर जी ने नाव चलायी। ललिताजी को उनके वस्त्रों में मुरली दिख गयी, ललिता जी बोलीं–‘अच्छा तो ये श्यामसुन्दर हैं ये नाविक के वेश में ! अभी बताते हैं इस नाविक को।’ जैसे ही किनारा आया सभी सखियाँ उतार गयीं। फिर सब सखियों ने कहा–‘अपनी उतराई तो लेते जाओ नाविक।’ सबने पकड़ कर श्यामसुन्दर को मानसी गंगा में फेंक दिया और बोलीं–‘बहुत हमारे गहने, माखन मटकी, मानसी गंगा में डलवा कर खुश हो रहे थे। अब ये लो उसका प्रसाद। ० ० ० ॥जय जय श्री राधे॥

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