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🌹 आज का भगवद चिंतन 🌹 *शबरी देखि राम गृह आये* चेला बोला-- भगवान मुझसे कह रहे हैं, आप सरल नहीं हो, और गुरु जी को इस बात पर रोना आ गया। कि सचमुच, सब कुछ जीवन में मिला, सरलता नहीं मिली, और जिससे भगवान मिलते थे, वही नहीं मिला। गुरु जी भाव विह्वल होकर रोने लगे, तो भगवान प्रकट हो गये। भगवान ने उनको दर्शन दिया। भगवान तो इस सरलता पर रीझते हैं। इसीलिए भगवान ने कहा-- नवम् सरल सब सन छल हीना। मम भरोस हिय हरष न दीना॥ ऐसा जो कोई सरल भक्त हो, मैं उसके लिए सरल हूँ। आगे भगवान ने कहा कि ये नौ प्रकार की भक्तियाँ हैं। •••• तो इन नौ में से कितनी भक्तियाँ हों तो कल्याण हो जाय ? भगवान ने कहा-- नौ में सात, पाँच, चार, दो, तीन, एक नहीं, नौ महँ एकहु जिन के होई। इन नौ प्रकार की भक्तियों में एक भी जिसके जीवन में हो। अच्छा महाराज! तो यह भक्ति करने का अधिकार किसे हैं ? •••••बड़ा विचित्र हैं, ज्ञान के सब अधिकारी नहीं होते हैं, वैराग्यवान ही ज्ञान का अधिकारी होता हैं। धर्म की व्यवस्थाएँ अलग-अलग हैं, यज्ञ के सब अधिकारी नहीं होते, पर भक्ति ऐसी हैं कि इसमें कोई अधिकार भेद नहीं। भगवान कहते हैं--- नौ महँ एकहु जिनके होई। नारि पुरुष सचराचर कोई॥ चाहे स्त्री हो, चाहे पुरुष हो, नारि पुरुष सचराचर कोई। अरे एक जगह तो और कहा भगवान ने भक्ति के लिए, कि केवल नारी-पुरुष की ही बात नहीं कहते हैं भगवान--- पुरुष नपुंसक नारि वा, ऐसा उदाहरण कहीं नहीं मिलेगा। भगवान कहते हैं-- पुरुष नपुंसक नारि वा जीव चराचर कोय। सर्व भाव भजि कपट तजि मोहि परम प्रिय सोय॥ कपट तजि, नवम् सरल सब सन छल हीना-- भगवान कहते हैं-- नौ में एक भी जिनके जीवन में हो। शबरी जी ने कहा-- मुझमें तो कोई भक्ति होगी नहीं, क्योंकि--- अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमन्द गँवारी॥ देखो, भक्त की दीनता देखो। भगवान शबरी जी की कुटिया को आश्रम समझ रहे हैं। ताहि देय गति राम उदारा। शबरी के आश्रम पगु धारा॥ और शबरी अपने आश्रम को भी घर समझती हैं। शबरी देखि राम गृह आये। मुनि के वचन समुझि जिय भाये॥ आज भगवान ढूंढते ढूंढते आये। श्री बिंदु जी महाराज लिखते हैं--- जो उस साँवरे को सदा ढूंढता है। उसे एक दिन साँवला ढूंढता है॥ जिसे ढूंढने का अमल पड़ चुका है। वह उस ढूंढने में मजा ढूंढता है॥ अरे दिल जिसे कुल जहाँ ढूंढता है। वह तुझमें तू उसको कहाँ ढूंढता है॥ न पूछो पतित बिंदु क्या ढूंढता है। पतित वंधु जी का पता ढूंढता है॥ भगवान आये और आज शबरी से कहा-- मैया! सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरे। मैया आपके जीवन में तो सभी नौ प्रकार की भक्तियाँ हैं।•••कैसे ? प्रथम भगति संतन कर संगा-- तो आप सत्संग के लिए आयीं घर छोड़कर और महात्माओं के बीच में कथा सुनी-- दूसर रति मम कथा प्रसंगा। मतंग ऋषि का गुरु भाव से आश्रय लिया और अब तक मेरा गुणगान करके मेरी प्रतीक्षा की हैं और गुरु जी ने कहा था-- राम राम करती रहना, भगवान को ढूंढने तुम्हें नहीं जाना पड़े़गा, भगवान तुम्हें ढूंढते हुये आयेंगे। मंत्र जाप मम दृढ़ विश्वासा। और निरत निरंतर सज्जन धर्म का पालन किया। तुम्हारा अपमान किया अभिमानियों ने, आचार के अभिमानियों ने, विचार के अभिमानियों ने; लेकिन सपनेहु नहिं देखइ पर दोषा और तुम इतनी सरल कि आज भी तुम भक्ति का साक्षात रूप हो, पर अपने में अधमता का ही अनुभव कर रही हो। ऐसी सरल शबरी माता! आपमें सभी भक्तियाँ हैं और यह भक्ति वर्णन के बहाने मैंने तो आपकी स्तुति ही की हैं। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरे। भगवान अब विदा लेते हैं, तो भगवान ने कहा कि माता! मैं आज्ञा हो तो जाऊँ। *🛕🛕 जय सीताराम जी 🛕🛕*

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Comments (1)

Pannalal Chouhan

Pannalal Chouhan

Nov 18, 2025

ॐ नमो नारायण नारायण हरि हरि