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*|| श्रीमद्भागवत का दिव्य प्रसंग ||* ************** *10,000 साल तक समुद्र के भीतर खड़े रहकर की गई घोर तपस्या! जब साक्षात भगवान श्रीहरि प्रकट हुए, तो प्रचेताओं ने मुक्ति या स्वर्ग न मांगकर ऐसा कौन सा दुर्लभ वरदान मांग लिया? और वृक्षों द्वारा पाली गई कन्या 'मारिषा' से कैसे हुआ दक्ष प्रजापति का दूसरा जन्म? जानिए श्रीमद्भागवत का यह दिव्य प्रसंग!* *विदुरजीने पूछा - ब्रह्मन्! आपने राजा प्राचीनबर्हिके जिन पुत्रों का वर्णन किया था, उन्होंने रुद्रगीत के द्वारा श्रीहरि की स्तुति करके क्या सिद्धि प्राप्त की? बार्हस्पत्य! मोक्षाधिपति श्री नारायण के अत्यन्त प्रिय भगवान् शंकर का अकस्मात् सान्निध्य प्राप्त करके प्रचेताओं ने मुक्ति तो प्राप्त की ही होगी; इससे पहले इस लोक में अथवा परलोक में भी उन्होंने क्या पाया- वह बतलाने की कृपा करें।* *श्रीमैत्रेयजी ने कहा - विदुरजी! पिता के आज्ञाकारी प्रचेताओं ने समुद्र के अंदर खड़े रहकर रुद्रगीत के जप रूपी यज्ञ और तपस्या के द्वारा समस्त शरीरों के उत्पादक भगवान् श्रीहरि को प्रसन्न कर लिया। तपस्या करते-करते दस हजार वर्ष बीत जाने पर पुराण पुरुष श्रीनारायण अपनी मनोहर कान्ति द्वारा उनके तपस्या जनित क्लेश को शान्त करते हुए सौम्य विग्रह से उनके सामने प्रकट हुए।* *गरुड़जी के कंधे पर बैठे हुए श्री भगवान् ऐसे जान पड़ते थे, मानो सुमेरु के शिखर पर कोई श्याम घटा छायी हो। उनके श्री अंग में मनोहर पीताम्बर और कण्ठ में कौस्तुभमणि सुशोभित थी। अपनी दिव्य प्रभा से वे सब दिशाओं का अन्धकार दूर कर रहे थे चमकीले सुवर्णमय आभूषणों से युक्त उनके कमनीय कपोल और मनोहर मुखमण्डल की अपूर्व शोभा हो रही थी। उनके मस्तक पर झिलमिलाता हुआ मुकुट शोभायमान था। प्रभु की आठ भुजाओं में आठ आयुध थे; देवता, मुनि और पार्षदगण सेवामें उपस्थित थे तथा गरुड़जी किन्नरों की भाँति साममय पंखों की ध्वनि से कीर्तिगान कर रहे थे। उनकी आठ लंबी-लंबी स्थूल भुजाओं के बीचमें लक्ष्मीजी से स्पर्धा करने वाली वनमाला विराजमान थी। आदिपुरुष श्रीनारायण ने इस प्रकार पधार कर अपने शरणागत प्रचेताओं की ओर दया दृष्टिसे निहारते हुए मेघके समान गम्भीर वाणी में कहा।* *श्री भगवान ने कहा - राजपुत्रो! तुम्हारा कल्याण हो। तुम सबमें परस्पर बड़ा प्रेम है और स्नेहवश तुम एक ही धर्मका पालन कर रहे हो। तुम्हारे इस आदर्श सौहार्द से मैं बड़ा प्रसन्न हूँ। मुझसे वर माँगो। जो पुरुष सायंकाल के समय प्रतिदिन तुम्हारा स्मरण करेगा, उसका अपने भाइयों में अपने ही समान प्रेम होगा तथा समस्त जीवों के प्रति मित्रता का भाव हो जायगा। जो लोग सायंकाल और प्रातःकाल एकाग्रचित्त से रुद्रगीत द्वारा मेरी स्तुति करेंगे, उनको मैं अभीष्ट वर और शुद्ध बुद्धि प्रदान करूँगा। तुमलोगों ने बड़ी प्रसन्नता से अपने पिता की आज्ञा शिरोधार्य की है, इससे तुम्हारी कमनीय कीर्ति समस्त लोकों में फैल जायगी। तुम्हारे एक बड़ा ही विख्यात पुत्र होगा। वह गुणोंमें किसी भी प्रकार ब्रह्माजी से कम नहीं होगा तथा अपनी सन्तान से तीनों लोकों को पूर्ण कर देगा।* *राजकुमारो! कण्डु ऋषि के तपोनाश के लिये इन्द्र की भेजी हुई प्रम्लोचा अप्सरा से एक कमल नयनी कन्या उत्पन्न हुई थी। उसे छोड़कर वह स्वर्गलोक को चली गयी। तब वृक्षों ने उस कन्या को लेकर पाला-पोसा। जब वह भूखसे व्याकुल होकर रोने लगी तब ओषधियों के राजा चन्द्रमा ने दयावश उसके मुँह में अपनी अमृतवर्षिणी तर्जनी अँगुली दे दी तुम्हारे पिता आजकल मेरी सेवा यानी भक्ति में लगे हुए हैं; उन्होंने तुम्हें सन्तान उत्पन्न करने की आज्ञा दी है। अतः तुम शीघ्र ही उस देवोपम सुन्दरी कन्या से विवाह कर लो। तुम सब एक ही धर्म में तत्पर हो और तुम्हारा स्वभाव भी एक-सा ही है; इसलिये तुम्हारे ही समान धर्म और स्वभाव वाली वह सुन्दरी कन्या तुम सभी की पत्नी होगी तथा तुम सभी में उसका समान अनुराग होगा। तुमलोग मेरी कृपासे दस लाख दिव्य वर्षोंतक पूर्ण बलवान् रहकर अनेकों प्रकार के पार्थिव और दिव्य भोग भोगोगे।* *अन्त में मेरी अविचल भक्तिसे हृदय का समस्त वासना रूप मल दग्ध हो जानेपर तुम इस लोक तथा परलोक के नरक तुल्य भोगों से उपरत होकर मेरे परमधाम को जाओगे। जिन लोगों के कर्म भगवदर्पण बुद्धि से होते हैं और जिनका सारा समय मेरी कथा वार्ताओं में ही बीतता है, वे गृहस्थाश्रम में रहें तो भी घर उनके बन्धन का कारण नहीं होते। वे नित्यप्रति मेरी लीलाएँ सुनते रहते हैं, इसलिये ब्रह्मवादी वक्ताओं के द्वारा मैं ज्ञान-स्वरूप परब्रह्म उनके हृदय में नित्य नया-नया-स

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Comments (2)

Lal  Singh 🇮🇳🇮🇳

Lal Singh 🇮🇳🇮🇳

Sep 26, 2026

ॐ नमो नारायण भगवते वासुदेवाय नमः शुभ दोपहर जी

Rama Devi Sahu

Rama Devi Sahu

Sep 26, 2026

🙏‼️ Om Namo Bhagavate Vasudevaya ‼️🙏 Subha Dopahar Ji 🙏