MyMandirInstall

लंका दहन की अद्भुत घटना के बाद महावीर हनुमान जी की वीरता की चर्चा केवल पृथ्वी तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि देवलोक, गंधर्वलोक, यक्षलोक और नागलोक तक गूंजने लगी। हर दिशा में एक ही नाम लिया जा रहा था—पवनपुत्र हनुमान। देवता उनकी भक्ति का गुणगान कर रहे थे, ऋषि उनके पराक्रम की प्रशंसा कर रहे थे और स्वयं भगवान श्रीराम अपने परम भक्त पर प्रसन्न थे। लेकिन जहां एक ओर पूरी सृष्टि हनुमान जी की महिमा का सम्मान कर रही थी, वहीं धरती के गर्भ में बसे रहस्यमयी नागलोक में कुछ पराक्रमी नाग योद्धाओं के हृदय में ईर्ष्या और अहंकार जन्म लेने लगा। उन्हें यह स्वीकार ही नहीं हो रहा था कि कोई वानर समस्त लोकों में सबसे महान योद्धा कहलाए। एक दिन नागलोक की विशाल सभा में सभी नाग योद्धा एकत्र हुए। सभा के मध्य सिंहासन पर नागराज विराजमान थे। तभी एक अत्यंत बलशाली और घमंडी नाग सेनापति क्रोध से भरकर बोला, "सभी लोग हनुमान की वीरता का गुणगान कर रहे हैं, लेकिन क्या किसी ने नागलोक के योद्धाओं का बल देखा है? यदि हनुमान वास्तव में इतने ही शक्तिशाली हैं तो उन्हें यहां बुलाया जाए। आज पूरी सृष्टि देखेगी कि सबसे बड़ा योद्धा कौन है।" नागराज ने गंभीर स्वर में कहा, "मूर्खता मत करो। हनुमान कोई साधारण वानर नहीं हैं। वे स्वयं भगवान श्रीराम के अनन्य भक्त हैं। उनके विरुद्ध युद्ध करना विनाश को आमंत्रण देना है। जहां श्रीराम का नाम होता है, वहां विजय स्वयं चली आती है।" लेकिन अहंकार से अंधा नाग सेनापति किसी की बात सुनने को तैयार नहीं था। उसने गर्व से कहा, "यदि वे इतने ही महान हैं तो मैं स्वयं उन्हें नागलोक आने के लिए विवश करूंगा। आज उनके बल की वास्तविक परीक्षा होगी।" कुछ समय बाद हनुमान जी हिमालय के ऊपर आकाश मार्ग से श्रीराम का स्मरण करते हुए जा रहे थे। उसी समय आकाश में अचानक सैकड़ों विशाल नाग प्रकट हो गए। उनके बीच वह घमंडी नाग सेनापति खड़ा था। उसने मार्ग रोकते हुए ऊंचे स्वर में कहा, "जय श्रीराम का नाम लेने वाले हनुमान! यदि तुम स्वयं को महान योद्धा समझते हो तो आज नागलोक की सेना का सामना करके दिखाओ। यहां से बिना युद्ध किए लौटना संभव नहीं है।" हनुमान जी ने शांत भाव से उसकी ओर देखा और मधुर स्वर में बोले, "मैं बिना कारण किसी से युद्ध नहीं करता। धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाना उचित है, लेकिन केवल अहंकार के कारण युद्ध करना अधर्म है। अभी भी समय है। अपने सैनिकों को लेकर लौट जाओ। मैं किसी का अनावश्यक विनाश नहीं चाहता।" हनुमान जी की विनम्रता को नाग सेनापति ने उनकी कमजोरी समझ लिया। वह क्रोध से चिल्लाया, "नाग सेना, आक्रमण करो!" अगले ही क्षण सैकड़ों नाग योद्धा एक साथ हनुमान जी पर टूट पड़े। पूरा आकाश फुफकारों और युद्ध की गर्जना से कांप उठा। किसी ने विषैले बाण छोड़े, किसी ने अग्नि की ज्वालाएं बरसाईं, तो कोई अपने विशाल शरीर से हनुमान जी को जकड़ने दौड़ा। लेकिन पवनपुत्र अडिग खड़े रहे। उन्होंने अपनी गदा उठाई और पहला ही प्रहार किया। गदा के स्पर्श से अनेक नाग योद्धा दूर जा गिरे। उनका साहस टूटने लगा, फिर भी वे युद्ध करते रहे। तभी नाग सेनापति ने अपना सबसे शक्तिशाली अस्त्र निकाला—दिव्य नागपाश। मंत्रों के उच्चारण के साथ वह नागपाश बिजली की गति से उड़ता हुआ हनुमान जी के चारों ओर लिपट गया। क्षणभर के लिए ऐसा लगा मानो पवनपुत्र बंध गए हों। नाग सेना में खुशी की लहर दौड़ गई। लेकिन अगले ही पल हनुमान जी ने आंखें बंद कर "जय श्रीराम" का उच्चारण किया। जैसे ही श्रीराम का नाम उनके मुख से निकला, दिव्य प्रकाश चारों ओर फैल गया। नागपाश जलकर स्वयं टूट गया और उसके टुकड़े आकाश से नीचे गिरने लगे। यह दृश्य देखकर नाग सेना भयभीत हो उठी। उन्हें पहली बार समझ आया कि श्रीराम के नाम की शक्ति के सामने कोई भी दिव्य अस्त्र टिक नहीं सकता। अब भी नाग सेनापति हार मानने को तैयार नहीं था। उसने अपने समस्त विष और समस्त शक्ति का प्रयोग किया। चारों ओर विषैले बादल फैल गए। आकाश काला पड़ गया। तभी हनुमान जी ने अपने दिव्य विराट स्वरूप का प्रकट किया। उनका शरीर पर्वतों से भी ऊंचा दिखाई देने लगा। उनकी पूंछ आकाश को छू रही थी और उनके तेज से चारों दिशाएं प्रकाशित हो उठीं। उनकी गर्जना सुनकर पर्वत कांपने लगे और नाग सैनिक भय से पीछे हटने लगे। फिर भी नाग सेनापति अंतिम प्रयास करते हुए पूरी शक्ति से हनुमान जी पर टूट पड़ा। लेकिन हनुमान जी ने केवल एक ही प्रहार किया। उनकी गदा नाग सेनापति के हाथ से टकराई और उसका अस्त्र दूर जा गिरा। अगले ही क्षण वह भूमि पर गिर पड़ा।

Post media

Comments (0)

No comments yet. Be the first to comment!