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SHREE SHARMA

112 days ago

महाराज रघु का अंतिम समय उनके जीवन के पूर्वार्ध जितना ही गौरवशाली और प्रेरणादायक था। उन्होंने सिद्ध किया कि एक सच्चा राजा वही है जो न केवल राज्य करना जानता है, बल्कि समय आने पर मोह-माया का त्याग करना भी जानता है। जब महाराज रघु के पुत्र अज युवा और शासन योग्य हो गए, तब रघु ने प्राचीन भारतीय परंपरा (वर्णाश्रम धर्म) का पालन करते हुए वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करने का निर्णय लिया। पुत्र को राज्याभिषेक: उन्होंने एक भव्य समारोह में अपने प्रतापी पुत्र अज को अयोध्या का सिंहासन सौंपा। वैराग्य का मार्ग: जिस राजा ने सोने की वर्षा करवाई थी और साक्षात इंद्र को युद्ध में परास्त किया था, वही राजा अब रेशमी वस्त्र त्यागकर वल्कल (पेड़ों की छाल) धारण कर वन की ओर चल पड़ा। कालिदास के 'रघुवंशम्' के अनुसार, रघु ने महल के पास ही एक शांत कुटिया बनाई और 'योग-साधना' में लीन हो गए। 1. मिट्टी का पात्र: उनके पास अब केवल मिट्टी का एक पात्र बचा था। जो हाथ कभी तलवार थामते थे, अब वे माला और कुशा (पवित्र घास) थामने लगे। 2. परमात्मा में विलीन: उन्होंने अपनी इंद्रियों को पूरी तरह जीत लिया था। वे घंटों ध्यान में बैठे रहते और अपनी आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का अभ्यास करते थे। महाराज रघु ने अपने जीवन के अंत में दो अत्यंत कठिन मार्ग एक साथ अपनाए थे: एक ओर उनके पुत्र अज राजसी सुखों के बीच शासन कर रहे थे। दूसरी ओर रघु कुटिया में रहकर मोक्ष की साधना कर रहे थे। एक ही समय में अयोध्या ने 'भोग' (अज का राज्य) और 'योग' (रघु की साधना) का अद्भुत मिलन देखा। अंततः, अपनी योग शक्ति के माध्यम से रघु ने अपने नश्वर शरीर का त्याग किया और मोक्ष (परम पद) प्राप्त किया। महाराज रघु ने आने वाली पीढ़ियों के लिए तीन बड़े आदर्श छोड़े: 1. शक्ति: जो न्याय के लिए हो। 2. संपत्ति: जो दान के लिए हो। 3. जीवन: जो अंततः ईश्वर को समर्पित हो। यही वह महान पृष्ठभूमि थी जिसने अयोध्या को इतना पवित्र बनाया कि स्वयं भगवान विष्णु को यहाँ राम के रूप में आने की इच्छा हुई।

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Comments (1)

Rama Devi Sahu

Rama Devi Sahu

May 11, 2026

🙏🏹 Jai Shree Ram 🏹🙏