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*संत एकनाथ एक बार हरिद्वार* *से गंगाजल की कांवड़ उठाकर रामेश्वर में चढ़ाने का संकल्प किया।* *मार्ग लम्बा था और बीच के रास्ते में एक सूखा निर्जन क्षेत्र पड़ा।* *दूर दूर तक न हरियाली, न जल।* *पास का पानी भी समाप्त हो गया और सभी कांवड़िये जल्दी से अगले गाँव तक पहुँचने की जल्दी में थे ताकि जल पी सकें।* *तभी सभी की दृष्टि शुष्क भूमि में एक गधे पर पड़ी जो वहां पड़ा प्यास से तड़प रहा था।* *अपने प्राणों पर बनी हो तो गधे पर ध्यान कौन ही देता और फिर किसी के पास पानी था भी नहीं।* *सभी आगे बढ़ गये।* *लेकिन पीछे चलते एकनाथ सहसा रुक गये।* *जिस मन में अद्वैत, सैद्धांतिक वेदांत के स्थान पर रोम रोम में बसा हो उनके लिए गर्दभ जैसा निकृष्ट जीव भी ब्रह्म का अंश होता है।* *एकनाथ जी ने काँवड़ भूमि पर रखी और पूरा गंगाजल उस मरते हुये गधे को पिला दिया।* *जल पड़ते ही जीवन जागा उस जीव में और वह उठ खड़ा हुआ।* *एकनाथ की आँखों में अश्रु आ गये और हाथ जोड़कर गदगद कंठ से बोल उठे, " देवाधिदेव इस अकिंचन का श्रम सार्थक हुआ। आपने जल ग्रहण कर इस भक्त का मान रख लिया।"* *उधर कैलाश पर महादेव बोल उठे थे, "युगों के बाद कालकूट विष से दग्ध मेरे गले में आज शीतलता की प्रतीति हुई है। मेरे प्रिय एकनाथ, तुम्हें कोटिशः धन्यवाद।"*

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