
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
191 days ago
*भगवान श्रीराम ने नर्मदा नदी को क्यों नहीं पार किया* ? प्रचलित मान्यताओं और स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, यह कहा जाता है कि भगवान श्रीराम ने अपने वनवास के दौरान नर्मदा नदी को पार (cross) नहीं किया था, बल्कि उन्होंने उसकी परिक्रमा की थी या उसके किनारे-किनारे यात्रा की थी। हालाँकि, वाल्मीकि रामायण में इसका स्पष्ट उल्लेख अलग हो सकता है, लेकिन जनमानस में जो मुख्य कारण प्रचलित हैं, वे निम्नलिखित हैं: 1. नर्मदा का 'कुंवारी' (Virgin) नदी होना: पौराणिक कथाओं के अनुसार, नर्मदा को 'चिरकुंवारी' माना जाता है। कथा है कि नर्मदा और सोनभद्र (सोन नदी) का विवाह होने वाला था, लेकिन सोनभद्र की रुचि नर्मदा की दासी 'जुहिला' में हो गई। इससे क्रोधित होकर नर्मदा ने आजीवन कुंवारी रहने की प्रतिज्ञा ली और उल्टी दिशा (पूर्व से पश्चिम) में बहने लगीं। ऐसी मान्यता है कि भगवान राम, मर्यादा पुरुषोत्तम होने के नाते, एक कुंवारी कन्या (नदी रूपी देवी) को लांघना या पार करना मर्यादा के विरुद्ध मानते थे। इसलिए उन्होंने नदी को पार करने के बजाय, उसके तट पर पूजा-अर्चना की और आगे बढ़े। 2. नर्मदा परिक्रमा की परंपरा: नर्मदा ही एकमात्र ऐसी नदी है जिसकी विधिवत परिक्रमा (circumambulation) की जाती है। यह माना जाता है कि भगवान राम ने भी इस परंपरा का सम्मान किया था। उन्होंने नर्मदा को पार करके उनका अपमान करने के बजाय, उनकी परिक्रमा मार्ग का अनुसरण किया या किनारे-किनारे चलकर दक्षिण की ओर प्रस्थान किया। इसीलिए आज भी नर्मदा परिक्रमा का बहुत महत्व है। 3. भौगोलिक और ऋषि-मुनियों का संपर्क: वनवास के दौरान भगवान राम चित्रकूट से होते हुए दंडकारण्य (वर्तमान छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश का हिस्सा) गए थे। नर्मदा के तट पर कई महान ऋषियों (जैसे भृगु, कपिल, मार्कण्डेय) के आश्रम थे। रामजी इन ऋषियों के दर्शन के लिए नर्मदा के किनारों पर ही विचरण करते रहे। जबलपुर के पास 'ग्वारीघाट' या 'रामघाट' जैसे स्थानों पर उनके रुकने और शिवलिंग (रेत के शिवलिंग) बनाकर पूजा करने के प्रमाण मिलते हैं, लेकिन नदी पार करने का जिक्र लोककथाओं में कम मिलता है। निष्कर्ष: वाल्मीकि रामायण के अनुसार रामजी विंध्याचल और सतपुड़ा को पार करते हुए दक्षिण (पंचवटी/नासिक) गए थे, जिसके लिए नर्मदा को पार करना भौगोलिक रूप से आवश्यक लगता है। लेकिन स्थानीय आस्था यही मानती है कि उन्होंने नर्मदा जी की पवित्रता और उनके 'कुंवारी' स्वरूप के सम्मान में उन्हें लांघा नहीं था।

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