
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
178 days ago
🌞~ वैदिक हिन्दू पंचांग ~🌞 ⛅दिनांक - 05 मार्च 2026 ⛅दिन - गुरुवार ⛅विक्रम संवत् - 2082 ⛅अयन - उत्तरायण ⛅ऋतु - वसंत ⛅मास - चैत्र ⛅पक्ष - कृष्ण ⛅तिथि - द्वितीया शाम 05:03 तक तत्पश्चात् तृतीया ⛅नक्षत्र - उत्तराफाल्गुनी सुबह 08:17 तक तत्पश्चात् हस्त ⛅योग - शूल प्रातः 07:46 तक तत्पश्चात् गण्ड ⛅राहुकाल - दोपहर 02:07 से दोपहर 03:35 तक (उज्जैन मानक समयानुसार) ⛅सूर्योदय - 06:45 ⛅सूर्यास्त - 06:32 (सूर्योदय एवं सूर्यास्त उज्जैन मानक समयानुसार) ⛅दिशा शूल - दक्षिण दिशा में ⛅ब्रह्ममुहूर्त - प्रातः 05:07 से प्रातः 05:56 तक (उज्जैन मानक समयानुसार) ⛅अभिजीत मुहूर्त - दोपहर 12:15 से दोपहर 01:02 (उज्जैन मानक समयानुसार) ⛅निशिता मुहूर्त - मध्यरात्रि 12:14 से मध्यरात्रि 01:06 तक (उज्जैन मानक समयानुसार) 🌥️व्रत पर्व विवरण - तुकारामजी द्वितीया 🌥️विशेष - द्वितीया को बृहती (छोटा बैंगन या कटेहरी) खाना निषिद्ध है।(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंड: 27.29-34) 🔹तीर्थ में पालने योग्य १२ नियम🔹 अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयशतानि च। लक्षं प्रदक्षिणा भूमेः कुम्भस्नानेन तत्फलम् ।। 🔸'हजारों अश्वमेध यज्ञ, सैकड़ों वाजपेय यज्ञ और लाखों बार पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने से जो फल होता है, वही फल एक बार कुम्भ-स्नान करने से प्राप्त हो जाता है।' 🔸तीर्थ में ये बारह नियम अगर कोई पालता है तो उसे तीर्थ का पूरा फायदा होता है: 🔸 (१) हाथों का संयम : गंगा में गोता भी मारा और अनधिकार किसीकी वस्तु ले ली या ऐसी-वैसी कोई चीज उठाकर मुँह में डाल ली तो पुण्यप्राप्ति का आनंद नहीं होगा । 🔸 (२) पैरों का संयम: कहीं भी चले गये मौज-मजा मारने के लिए... नहीं, अनुचित जगह पर न जायें । 🔸 (३) मन को दूषित विचारों व चिंतन से बचाकर भगवच्चिंतन करना । 🔸 (४) सत्संग व वेदांत शास्त्र का आश्रय लेना : ऐसा नहीं कि शरीर में बुखार है और दे मारा गोता । पुण्यलाभ करें और फिर हो गया बुखार या न्यूमोनिया और आदमी मर गया, ऐसा नहीं करना चाहिए । देश,काल और शरीर की अवस्था देखनी चाहिए । 🔸 (५) तपस्या। 🔸 (६) भगवान की कीर्ति, भगवान के गुणों का गान कुम्भ-स्थान पर करना चाहिए । 🔸 (७) परिग्रह का त्याग : कोई कुछ चीज दे तो तीर्थ में दान नहीं लेना चाहिए । तीर्थ में दूसरों की सुविधाओं का उपयोग करके अपने ऊपर बोझा न चढ़ायें । दान का खाना, अशुद्ध खाना, प्रसाद में धोखेबाजी करके बार-बार लेना... अशुद्ध व्यवहार पुण्य क्षीण और हृदय को मलिन करता है । एक तरफ पुण्य कमा रहे हैं, दूसरी तरफ बोझा चढ़ा रहे हैं । यह न करें । 🔸 (८) जैसी भी परिस्थिति हो, आत्मसंतोष होना चाहिए । हाय रे ! धक्का धक्की है, बस नहीं मिली... ऐसा करके चित्त नहीं बिगाड़ना । 'हरे-हरे ! वाह ! यार की मौज ! तेरी मर्जी पूरण हो !' - इस प्रकार अपने चित्त को संतुष्ट रखें । 🔸 (९) किसी प्रकार के अहंकार को न पोसें: 'मैं तो तीन बजे उठा था, मैं तो इतने मील पैदल गया और मैंने तो १० डुबकियाँ लगायीं.... - ऐसा अहंकार पुण्य को क्षीण कर देता है । भगवान की कृपा है जो पुण्यकर्म हुआ, उसको छुपाकर रखो । 🔸 (१०) 'यह करूँगा, यह भोगूँगा, इधर जाऊँगा, उधर जाऊँगा.... इसका चिंतन न करें । 'मैं कौन हूँ ? जन्म के पहले मैं कौन था, अभी कौन हूँ और बाद में कौन रहूँगा ? तो मैं तो वही चैतन्य आत्मा हूँ । मैं जन्म के पहले था, अभी हूँ और बाद में भी रहूँगा ।' - इस प्रकार अपने स्वभाव में आने का प्रयत्न करें । 🔸(११) दम्भ, दिखावा न करें । 🔸(१२) इन्द्रिय-लोलुपता नहीं । कुछ भी खा लिया कि मजा आता है, कहीं भी चले गये... तो मौज-मजा मारने के लिए कुम्भ-स्नान नहीं है । सच्चाई, सत्कर्म और प्रभु-स्नेह से तपस्या करके अंतरात्मा का माधुर्य जगाने के लिए और हृदय को प्रसन्नता दिलाने के लिए तथा सत्संग के रहस्य का प्रसाद पाने के लिए कुम्भ-स्नान है ।" ▬▬๑⁂❋⁂๑▬▬ 🚩जय श्री राम🚩 🚩धर्मो रक्षति रक्षितः 🇮🇳हिन्दू राष्ट्र भारत

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