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SHREE SHARMA

116 days ago

#राम #कान में #बाली पहनने की यह परंपरा फैशन से कहीं अधिक #एक्यूप्रेशर (#Accupressure) और #तंत्रिकाविज्ञान (#Neurology) के अद्भुत मेल को दर्शाती है। जिसे आज हम एक 'स्टाइल स्टेटमेंट' मानते हैं, वह वास्तव में प्राचीन ऋषियों द्वारा खोजी गई एक #प्राकृतिक #चिकित्सा #पद्धति है। 1. एक्यूप्रेशर और मस्तिष्क का जुड़ाव कान का निचला हिस्सा (#Ear lobe) शरीर के सबसे संवेदनशील अंगों में से एक है। #दिमाग की नसें: एक्यूप्रेशर विज्ञान के अनुसार, कान के निचले हिस्से के ठीक बीच में एक ऐसा बिंदु होता है जो मस्तिष्क के बाएं और दाएं गोलार्ध (Hemispheres) से जुड़ा होता है। #एकाग्रता (#Concentration): जब इस बिंदु पर छिद्र करके धातु (विशेषकर सोना या चांदी) पहनी जाती है, तो वह एक निरंतर दबाव बनाए रखती है। यह दबाव मस्तिष्क की तंत्रिकाओं को सक्रिय रखता है, जिससे सोचने की क्षमता और एकाग्रता में सुधार होता है। 2. आंखों की रोशनी का विज्ञान कान के इसी हिस्से का सीधा संबंध हमारी दृष्टि से भी होता है। ऑप्टिक नर्व्स (Optic Nerves): कान के जिस बिंदु को छिदवाया जाता है, वहां से गुजरने वाली नसें आंखों की रोशनी को नियंत्रित करने वाले केंद्रों से जुड़ी होती हैं। आयुर्वेद के अनुसार, इस बिंदु पर निरंतर दबाव रहने से आंखों की रोशनी तेज होती है और लंबे समय तक आंखों की समस्याएं दूर रहती हैं। 3. धातुओं का 'हीलिंग' प्रभाव धातु पहनना केवल सजावट नहीं, बल्कि शरीर की ऊर्जा को संतुलित करने का एक तरीका है। #सोना और #चांदी: सोना शरीर में गर्माहट और ऊर्जा का संचार करता है, जबकि चांदी शीतलता प्रदान करती है। ये धातुएं त्वचा के संपर्क में रहकर शरीर की विद्युत-चुंबकीय ऊर्जा (Electromagnetic Energy) को नियंत्रित करती हैं, जो मानसिक शांति के लिए जरूरी है। #संक्रमण से बचाव: प्राचीन समय में यह भी माना जाता था कि कान छिदवाने से हिस्टीरिया और मिर्गी जैसी बीमारियों के लक्षणों में कमी आती है। 4. सुनने की क्षमता (Hearing Power) कान छिदवाने का यह बिंदु सुनने की क्षमता को भी प्रभावित करता है। निरंतर दबाव और धातु के कंपन से सुनने वाली नसें (Auditory Nerves) सक्रिय रहती हैं, जिससे #उम्र बढ़ने के साथ होने वाली सुनने की #कमजोरी का खतरा कम हो जाता है।

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