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SHREE SHARMA

66 days ago

धृतराष्ट्र की दूसरी पत्नी और 'युयुत्सु' का जन्म: जब महर्षि वेदव्यास के आशीर्वाद से गांधारी गर्भवती हुईं, तो उनका गर्भ सामान्य ९ महीने के बजाय दो वर्षों तक खिंच गया। हस्तिनापुर के राजमहल में सभी चिंतित थे। इसी बीच समाचार आया कि कुंती ने युधिष्ठिर को जन्म दे दिया है, जो पांडवों के ज्येष्ठ पुत्र और हस्तिनापुर के भावी उत्तराधिकारी बनने के योग्य थे। इस समाचार से धृतराष्ट्र अत्यंत व्याकुल और निराश हो गए। उन्हें लगा कि गांधारी शायद कभी संतान को जन्म नहीं दे पाएगी और राजा का पद उनके हाथ से हमेशा के लिए निकल जाएगा। धृतराष्ट्र जन्म से अंधे होने के कारण पहले ही हीनभावना से ग्रसित थे, और इस स्थिति ने उनकी मानसिक व्याकुलता को और बढ़ा दिया। उस कठिन समय में गांधारी की सेवा के लिए गांधार देश से ही आई एक अत्यंत उच्च कुलीन दासी (या परिचारिका) नियुक्त थी, जिसका नाम था सौबली (कुछ ग्रंथों में इन्हें राजा सुबल के कुल से संबंधित होने के कारण सौबली और कुछ स्थानों पर वैश्य वर्ण की होने के कारण करणी भी कहा गया है)। सौबली स्वभाव से अत्यंत शांत, बुद्धिमान और सेवाभावी थी। धृतराष्ट्र की सेवा करते-करते और उनकी व्याकुलता को देखते हुए, उन दोनों के बीच एक अनकहा संबंध स्थापित हुआ। धृतराष्ट्र ने सौबली को अपनी दूसरी पत्नी का स्थान दिया (यद्यपि वह दासी पुत्र कहलाया, पर उसे कुरुवंश के राजकुमारों जैसे ही अधिकार प्राप्त थे)। उसी समय, जब गांधारी ने हताशा में अपने पेट पर प्रहार किया और व्यास जी ने उस मांस के पिंड को १०१ मटकों में रखा, ठीक उसी कालखंड में सौबली के गर्भ से एक अत्यंत तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ। इस पुत्र का नाम रखा गया—युयुत्सु। अद्भुत बात यह थी कि जिस दिन गांधारी के मटके से दुर्योधन का जन्म हुआ, ठीक उसी दिन सौबली के गर्भ से युयुत्सु ने भी जन्म लिया। इस प्रकार युयुत्सु तकनीकी रूप से दुर्योधन का जुड़वां भाई (सौतेला भाई) था। युयुत्सु बचपन से ही दुर्योधन और दुशासन की संगति से दूर रहता था। उसके भीतर विदुर जी की तरह धर्म, न्याय और विवेक के गुण कूट-कूट कर भरे थे। जब कुरुक्षेत्र का युद्ध शुरू होने वाला था और दोनों सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं, तब युद्ध की घोषणा से ठीक पहले महाराज युधिष्ठिर अपने रथ से उतरे और कौरव सेना के सामने जाकर खड़े हो गए। युधिष्ठिर ने ऊंचे स्वर में कहा, "हे वीरों! यह धर्म और अधर्म का युद्ध है। यदि कौरवों की सेना में कोई भी ऐसा योद्धा है जिसका मन यह कहता है कि धर्म पांडवों की ओर है, तो वह अभी भी अपनी सेना बदलकर हमारे पाले में आ सकता है। हम उसका ससम्मान स्वागत करेंगे। पूरी कौरव सेना में सन्नाटा छा गया। दुर्योधन मुस्कुरा रहा था कि कोई उसकी सेना छोड़कर नहीं जाएगा। लेकिन तभी, सौ कौरवों के बीच से एक रथ आगे बढ़ा। वह रथ किसी और का नहीं, बल्कि धृतराष्ट्र के पुत्र युयुत्सु का था। युयुत्सु ने दुर्योधन की तरफ देखा और कहा, "भ्राता दुर्योधन! मैं तुम्हारे अधर्म का साथी नहीं बन सकता। राजपद और प्राणों से बड़ा धर्म होता है।" युयुत्सु ने अपनी सेना बदली और पांडवों की तरफ जाकर खड़े हो गए। दुर्योधन क्रोध से जल उठा, पर वह कुछ कर नहीं सका। अठारह दिनों के भयानक युद्ध में धृतराष्ट्र के सौ के सौ पुत्र (दुर्योधन सहित) भीम के हाथों मारे गए। धृतराष्ट्र का कोई भी पुत्र जीवित नहीं बचा, सिवाय युयुत्सु के। चूंकि युयुत्सु ने धर्म का साथ दिया था, इसलिए पांडवों ने पूरे युद्ध के दौरान उसकी रक्षा की। युद्ध समाप्त होने के बाद, जब युधिष्ठिर हस्तिनापुर के सम्राट बने, तो उन्होंने युयुत्सु को राज्य का महामंत्री नियुक्त किया और धृतराष्ट्र व गांधारी की सेवा का उत्तरदायित्व सौंपा। इतना ही नहीं, जब छत्तीस वर्षों बाद पांडव अपना राज-पाठ त्याग कर स्वर्गारोहण (हिमालय) के लिए निकलने लगे, तब उन्होंने अर्जुन के पोते परीक्षित (अभिमन्यु के पुत्र) को राजा बनाया। चूंकि परीक्षित उस समय बहुत छोटे थे, इसलिए पांडवों ने युयुत्सु को पूरे हस्तिनापुर का संरक्षक नियुक्त किया। !! जय श्री कृष्ण!!

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Comments (4)

बरखा शर्मा

बरखा शर्मा

Jun 26, 2026

🌹Har Har Mahadev Ji Shubh Ratri ji🙏✨🌹

Saumya Sharma

Saumya Sharma

Jun 26, 2026

हर हर महादेव 🙏 जय शिव शक्ति 🙏 बाबा भोलेनाथ और मां आदिशक्ति भवानी जी की कृपा से आप सदैव स्वस्थ और खुशहाल रहें 🙏 इसी शुभकामना के साथ सुप्रभात वंदन भाई जी 🙏🌹☺️

सविता

सविता

Jun 25, 2026

om namah shivay 🙏🌹 shubh prabhat vandan